Question 132Asked in CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 7 Feb 2026 + 1 more paper

नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर प्रश्न के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए :

नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर प्रश्न के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए : समाज में पड़ते ही मनुष्य देखने लगता है कि उसकी स्थिति दोहरी हो गई है। वह देखता है कि मैं यह हूँ, और मैं बड़ा समझा जाता हूँ। इस निश्चय के साथ एक यह निश्चय और जुड़ जाने से कि मैं बड़ा समझा जाता हूँ मनुष्य के आनंद या सुख के अनुभव में वृद्धि होती है। इसी प्रकार मैं क्षुद्र हूँ इस धारणा के साथ मैं क्षुद्र समझा जाता हूँ इस धारणा के योग से दुःख के अनुभव की वृद्धि होती है। इस प्रकार स्थिति के एकांत और सामाजिक दो विभाग हो जाने से कोई तो दोनों विभागों पर दृष्टि रख सकते हैं और कोई एक ही पर। शक्तिशाली और प्रतिभा सम्पन्न मनुष्य पहले यह प्रयत्न करते हैं कि ‘हम ऐसे हों’। फिर वैसे हो जाने पर यदि आवश्यक हुआ तो वे यह प्रयत्न भी करते हैं कि ‘हम ऐसे समझे जाएँ’। इन दोनों के प्रयत्न जुदा-जुदा हैं। संसार में शक्ति सम्पन्न सब नहीं होते, इससे बहुत से लोग स्थिति के पहले विभाग के लिए जिन प्रयत्नों की आवश्यकता है उनमें अपने को असमर्थ देख दूसरे ही विभाग से किसी प्रकार अपना संतोष करना चाहते हैं और उसी पर दृष्टि रखकर प्रयत्न करते हैं। ईर्ष्या ऐसे लोगों के हृदय में बहुत जगह पाती है और उनके प्रयत्नों में सहायक भी होती है। भाव प्रवर्तन आदि के बल से जिस समुदाय के प्राणी परस्पर ऐसे बन गए हैं कि अपने इंद्रियानुभव और भावनाओं तक को जवाब देकर दूसरों के इंद्रियानुभव और भावनाओं द्वारा निर्वाह कर सकते हैं, उसी से ईर्ष्या का विकास हो सकता है। अतः ईर्ष्या का अनन्य अधिकार मनुष्य जाति ही पर है। एक कुत्ता किसी दूसरे कुत्तों को कुछ खाते देख उसे आप खाने की इच्छा कर सकता है, पर वह यह नहीं चाह सकता कि चाहे हम खाएँ या न खाएँ वह दूसरा कुत्ता न खाने पाए। दूसरे कुत्तों की दृष्टि में हमारी स्थिति कैसी है, इसकी चिंता उस कुत्ते को न होगी। अपने विषय में दूसरों के चित्त में अच्छी धारणा उत्पन्न करने का प्रयत्न अच्छी बात है। इस प्रयत्न को जो बुरा रूप प्राप्त होता है वह असत्य के समावेश के कारण, दूसरों की धारणा की अवास्तविकता और अपनी स्थिति की सापेक्षता के कारण, जब हम अपने विषय में दूसरों की झूठी धारणा और अपनी स्थिति के सापेक्ष रूप मात्र से संतोष करना चाहते हैं तभी बुराइयों के लिए जगह होती है और ईर्ष्या की राह खुलती है। ‘मानव की स्थिति दोहरी हो गई है’ का आशय है
  1. Aजैसा हूँ वैसा नहीं समझा जाता
  2. Bजैसा हूँ वैसा ही समझा जाता हूँ
  3. Cन समझता हूँ, न समझना चाहता हूँ
  4. Dकोई कुछ भी समझे मुझे फर्क नहीं पड़ता
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Correct answer: (A) जैसा हूँ वैसा नहीं समझा जाता

Explanation

समाज में आकर मनुष्य की स्थिति दो भागों में बँट जाती है: वह जो वास्तव में है और वह जैसा समझा जाता है। ये दोनों अलग हो सकते हैं, यानी वह जैसा है वैसा नहीं समझा जाता; इसलिए विकल्प (1) सही है।

From CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 7 Feb 2026 — Previous Year Paper

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