निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों (प्र.सं. 128 से 135) में सही/सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए ।
निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों (प्र.सं. 128 से 135) में सही/सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए ।
क्षमा सभी धर्मों का आधार है । क्षमा नफ़रत का निदान है । क्षमादान देना और क्षमा याचना करना दोनों महानता की निशानी हैं । क्षमा देने वाले की भाँति क्षमा माँगने वाला भी उतना ही श्रेष्ठ है । अपनी ग़लती पर क्षमा माँगने से उसके हृदय में विनयशीलता का जो भाव उपजता है, इससे उसका कद पहले की अपेक्षा और अधिक बढ़ जाता है । नीति में क्षमा का स्थान बहुत ऊँचा है । क्षमा भाव नीति का ही अंग है । यह अहंकार के त्याग का सूचक है । क्षमा के धरातल पर दो व्यक्तित्व उभरते हैं एक आप और एक सामने वाला । अहम के वशीभूत होकर जब हम अपनी ग़लती नहीं स्वीकारते तो क्षमा के विषय में संकोच करते हैं ।
यह भी संभव है कि समय-समय पर ग्लानि की अनुभूति हृदय में हो, पर इसको उजागर होने से रोक देता है । इस पीड़ा की प्रतीति हर मनुष्य को होती है । इसी प्रकार सामने वाला भी सोचता होगा कि हम क्षमा माँगें और वह क्षमा कर देगा । यह द्वंद्व निरंतर चलता है और इसका निराकरण क्षमा से जाता है । क्षमा में लेशमात्र भी कायरता नहीं है । सहिष्णुता, समता, सहनशीलता, मैत्रीभाव और उदारता जैसे सामर्थ्य युक्त गुण, पुरुषार्थहीन या अधैर्यवान लोगों में उत्पन्न नहीं हो सकते । निश्चित ही इन गुणों को पाने में अक्षम लोग ही क्षमा को कायरता बताने का प्रयास करते हैं । यह अधीरों का एवं कठिन पुरुषार्थ से बचने का उपक्रम होता है । क्षमा व्यक्तित्व में तेजस्विता उत्पन्न करती है ।
वाक्य पूरा कीजिए :
अहमवश अपनी ग़लती न मानकर ____________ ।
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Correct answer: (C) क्षमा माँगने में संकोच करते हैं
Explanation
गद्यांश में कहा गया है कि अहम के वशीभूत होकर जब हम अपनी ग़लती नहीं स्वीकारते तो क्षमा के विषय में संकोच करते हैं।