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गद्यांश / पद्यांश के प्रश्न (page 4)

229 गद्यांश / पद्यांश (Hindi) questions asked in CTET previous year papers, each with the correct answer and explanation. Read them free on UTpaper, or attempt the full papers as timed online tests.

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Q151CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 1 Mar 2026
निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों (प्र.सं. 128 से 135) में सही/सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए । क्षमा सभी धर्मों का आधार है । क्षमा नफ़रत का निदान है । क्षमादान देना और क्षमा याचना करना दोनों महानता की निशानी हैं । क्षमा देने वाले की भाँति क्षमा माँगने वाला भी उतना ही श्रेष्ठ है । अपनी ग़लती पर क्षमा माँगने से उसके हृदय में विनयशीलता का जो भाव उपजता है, इससे उसका कद पहले की अपेक्षा और अधिक बढ़ जाता है । नीति में क्षमा का स्थान बहुत ऊँचा है । क्षमा भाव नीति का ही अंग है । यह अहंकार के त्याग का सूचक है । क्षमा के धरातल पर दो व्यक्तित्व उभरते हैं एक आप और एक सामने वाला । अहम के वशीभूत होकर जब हम अपनी ग़लती नहीं स्वीकारते तो क्षमा के विषय में संकोच करते हैं । यह भी संभव है कि समय-समय पर ग्लानि की अनुभूति हृदय में हो, पर इसको उजागर होने से रोक देता है । इस पीड़ा की प्रतीति हर मनुष्य को होती है । इसी प्रकार सामने वाला भी सोचता होगा कि हम क्षमा माँगें और वह क्षमा कर देगा । यह द्वंद्व निरंतर चलता है और इसका निराकरण क्षमा से जाता है । क्षमा में लेशमात्र भी कायरता नहीं है । सहिष्णुता, समता, सहनशीलता, मैत्रीभाव और उदारता जैसे सामर्थ्य युक्त गुण, पुरुषार्थहीन या अधैर्यवान लोगों में उत्पन्न नहीं हो सकते । निश्चित ही इन गुणों को पाने में अक्षम लोग ही क्षमा को कायरता बताने का प्रयास करते हैं । यह अधीरों का एवं कठिन पुरुषार्थ से बचने का उपक्रम होता है । क्षमा व्यक्तित्व में तेजस्विता उत्पन्न करती है । क्षमा करने से व्यक्तित्व में क्या प्रकट नहीं होता ?
  1. Aकायरता
  2. Bसरलता
  3. Cआनंद
  4. Dतेजस्विता
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Correct answer: (A) कायरता

Explanation

गद्यांश में कहा गया है कि क्षमा में लेशमात्र भी कायरता नहीं है और यह व्यक्तित्व में तेजस्विता उत्पन्न करती है; अतः क्षमा से कायरता प्रकट नहीं होती।

Q152CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 1 Mar 2026
निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों (प्र.सं. 128 से 135) में सही/सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए । क्षमा सभी धर्मों का आधार है । क्षमा नफ़रत का निदान है । क्षमादान देना और क्षमा याचना करना दोनों महानता की निशानी हैं । क्षमा देने वाले की भाँति क्षमा माँगने वाला भी उतना ही श्रेष्ठ है । अपनी ग़लती पर क्षमा माँगने से उसके हृदय में विनयशीलता का जो भाव उपजता है, इससे उसका कद पहले की अपेक्षा और अधिक बढ़ जाता है । नीति में क्षमा का स्थान बहुत ऊँचा है । क्षमा भाव नीति का ही अंग है । यह अहंकार के त्याग का सूचक है । क्षमा के धरातल पर दो व्यक्तित्व उभरते हैं एक आप और एक सामने वाला । अहम के वशीभूत होकर जब हम अपनी ग़लती नहीं स्वीकारते तो क्षमा के विषय में संकोच करते हैं । यह भी संभव है कि समय-समय पर ग्लानि की अनुभूति हृदय में हो, पर इसको उजागर होने से रोक देता है । इस पीड़ा की प्रतीति हर मनुष्य को होती है । इसी प्रकार सामने वाला भी सोचता होगा कि हम क्षमा माँगें और वह क्षमा कर देगा । यह द्वंद्व निरंतर चलता है और इसका निराकरण क्षमा से जाता है । क्षमा में लेशमात्र भी कायरता नहीं है । सहिष्णुता, समता, सहनशीलता, मैत्रीभाव और उदारता जैसे सामर्थ्य युक्त गुण, पुरुषार्थहीन या अधैर्यवान लोगों में उत्पन्न नहीं हो सकते । निश्चित ही इन गुणों को पाने में अक्षम लोग ही क्षमा को कायरता बताने का प्रयास करते हैं । यह अधीरों का एवं कठिन पुरुषार्थ से बचने का उपक्रम होता है । क्षमा व्यक्तित्व में तेजस्विता उत्पन्न करती है । समय-समय पर ग्लानि की अनुभूति कब होती है ?
  1. Aजब हम क्षमा माँगने में संकोच करते हैं ।
  2. Bजब हम क्षमा माँग लेते हैं ।
  3. Cजब हम ग़लती स्वीकार लेते हैं ।
  4. Dजब हम क्षमा दे देते हैं ।
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Correct answer: (A) जब हम क्षमा माँगने में संकोच करते हैं ।

Explanation

गद्यांश के अनुसार अहम के कारण जब हम क्षमा माँगने में संकोच करते हैं, तब समय-समय पर हृदय में ग्लानि की अनुभूति होती है, पर उसे उजागर नहीं होने देते।

Q153CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 8 Feb 2026
नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर सबसे सही उत्तर वाले विकल्प का चयन करिए। ‘अध्ययन’ शब्द का सामान्य अर्थ है – पढ़ना और इसका विशिष्ट अर्थ है – पढ़ने के साथ गुनना अर्थात् हम जो कुछ भी पढ़ते हैं, उस पर गहराई से चिंतन-मनन करना। अध्ययन के द्वारा अपनी रुचियों को विस्तृत, जागृत और परिष्कृत किया जा सकता है, तरह-तरह के विषयों का ज्ञान सहजता से प्राप्त किया जा सकता है, अंधविश्वासों और गलत धारणाओं को मिटाया जा सकता है, आत्मिक शान्ति का लाभ भी पाया जा सकता है। अध्ययन का तात्पर्य पुस्तक में छपी सूचना पढ़कर याद कर लेना नहीं है। अध्ययन के लिए असीमित विषयक्षेत्र हैं – साहित्य, संगीत, विज्ञान, धर्म, दर्शन, मनोरंजन आदि। अध्ययन ने नए क्षितिज का उद्घाटन किया है। यह कहना अतिश्योक्ति न होगा कि अध्ययन – मनन प्रत्येक क्षेत्र की मूल समृद्धि का आधार है। ‘जागृति’ का विलोम है -
  1. Aसृष्टि
  2. Bसुषुप्ति
  3. Cसचेत
  4. Dसीमित
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Correct answer: (B) सुषुप्ति

Explanation

‘जागृति’ का अर्थ है जागना या सचेत होना; इसका विलोम ‘सुषुप्ति’ (गहरी नींद की अवस्था) है।

Q154CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 8 Feb 2026
नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर सबसे सही उत्तर वाले विकल्प का चयन करिए। ‘अध्ययन’ शब्द का सामान्य अर्थ है – पढ़ना और इसका विशिष्ट अर्थ है – पढ़ने के साथ गुनना अर्थात् हम जो कुछ भी पढ़ते हैं, उस पर गहराई से चिंतन-मनन करना। अध्ययन के द्वारा अपनी रुचियों को विस्तृत, जागृत और परिष्कृत किया जा सकता है, तरह-तरह के विषयों का ज्ञान सहजता से प्राप्त किया जा सकता है, अंधविश्वासों और गलत धारणाओं को मिटाया जा सकता है, आत्मिक शान्ति का लाभ भी पाया जा सकता है। अध्ययन का तात्पर्य पुस्तक में छपी सूचना पढ़कर याद कर लेना नहीं है। अध्ययन के लिए असीमित विषयक्षेत्र हैं – साहित्य, संगीत, विज्ञान, धर्म, दर्शन, मनोरंजन आदि। अध्ययन ने नए क्षितिज का उद्घाटन किया है। यह कहना अतिश्योक्ति न होगा कि अध्ययन – मनन प्रत्येक क्षेत्र की मूल समृद्धि का आधार है। ‘अध्ययन से विकास, उन्नति और प्रगति के रास्ते खुलते हैं।’ यह भाव गद्यांश की किस पंक्ति में व्यक्त किया गया है?
  1. A‘अध्ययन’ का सामान्य अर्थ है पढ़ना।
  2. Bअध्ययन प्रत्येक क्षेत्र की मूल समृद्धि का आधार है।
  3. Cअध्ययन के लिए असीमित विषय क्षेत्र हैं।
  4. Dआत्मिक शान्ति का लाभ पाया जा सकता है।
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Correct answer: (B) अध्ययन प्रत्येक क्षेत्र की मूल समृद्धि का आधार है।

Explanation

गद्यांश की अंतिम पंक्ति कहती है कि अध्ययन-मनन प्रत्येक क्षेत्र की मूल समृद्धि का आधार है, यानी हर क्षेत्र का विकास और प्रगति अध्ययन से ही होती है।

Q155CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 8 Feb 2026
नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर सबसे सही उत्तर वाले विकल्प का चयन करिए। ‘अध्ययन’ शब्द का सामान्य अर्थ है – पढ़ना और इसका विशिष्ट अर्थ है – पढ़ने के साथ गुनना अर्थात् हम जो कुछ भी पढ़ते हैं, उस पर गहराई से चिंतन-मनन करना। अध्ययन के द्वारा अपनी रुचियों को विस्तृत, जागृत और परिष्कृत किया जा सकता है, तरह-तरह के विषयों का ज्ञान सहजता से प्राप्त किया जा सकता है, अंधविश्वासों और गलत धारणाओं को मिटाया जा सकता है, आत्मिक शान्ति का लाभ भी पाया जा सकता है। अध्ययन का तात्पर्य पुस्तक में छपी सूचना पढ़कर याद कर लेना नहीं है। अध्ययन के लिए असीमित विषयक्षेत्र हैं – साहित्य, संगीत, विज्ञान, धर्म, दर्शन, मनोरंजन आदि। अध्ययन ने नए क्षितिज का उद्घाटन किया है। यह कहना अतिश्योक्ति न होगा कि अध्ययन – मनन प्रत्येक क्षेत्र की मूल समृद्धि का आधार है। गद्यांश में अध्ययन के किस विषय का उल्लेख नहीं हुआ है?
  1. Aदर्शन
  2. Bविज्ञान
  3. Cइतिहास
  4. Dसाहित्य
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Correct answer: (C) इतिहास

Explanation

गद्यांश में साहित्य, संगीत, विज्ञान, धर्म, दर्शन और मनोरंजन का नाम है, पर इतिहास का उल्लेख नहीं है।

Q156CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 8 Feb 2026
नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर सबसे सही उत्तर वाले विकल्प का चयन करिए। ‘अध्ययन’ शब्द का सामान्य अर्थ है – पढ़ना और इसका विशिष्ट अर्थ है – पढ़ने के साथ गुनना अर्थात् हम जो कुछ भी पढ़ते हैं, उस पर गहराई से चिंतन-मनन करना। अध्ययन के द्वारा अपनी रुचियों को विस्तृत, जागृत और परिष्कृत किया जा सकता है, तरह-तरह के विषयों का ज्ञान सहजता से प्राप्त किया जा सकता है, अंधविश्वासों और गलत धारणाओं को मिटाया जा सकता है, आत्मिक शान्ति का लाभ भी पाया जा सकता है। अध्ययन का तात्पर्य पुस्तक में छपी सूचना पढ़कर याद कर लेना नहीं है। अध्ययन के लिए असीमित विषयक्षेत्र हैं – साहित्य, संगीत, विज्ञान, धर्म, दर्शन, मनोरंजन आदि। अध्ययन ने नए क्षितिज का उद्घाटन किया है। यह कहना अतिश्योक्ति न होगा कि अध्ययन – मनन प्रत्येक क्षेत्र की मूल समृद्धि का आधार है। ‘अध्ययन ने नए क्षितिज का उद्घाटन किया है।’ वाक्य से आशय है :
  1. Aअध्ययन से विकास का नया क्षेत्र सामने आया है।
  2. Bअध्ययन कल्पनाशीलता को पुष्ट करता है।
  3. Cनई-नई पुस्तकों का विमोचन होना ज़रूरी है।
  4. Dअध्ययन से अपार संभावनाओं के द्वार खुलते हैं।
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Correct answer: (D) अध्ययन से अपार संभावनाओं के द्वार खुलते हैं।

Explanation

‘नए क्षितिज का उद्घाटन’ का अर्थ है नई संभावनाओं के रास्ते खुलना; अतः अध्ययन से अपार संभावनाओं के द्वार खुलते हैं।

Q157CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 8 Feb 2026
नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर सबसे सही उत्तर वाले विकल्प का चयन करिए। ‘अध्ययन’ शब्द का सामान्य अर्थ है – पढ़ना और इसका विशिष्ट अर्थ है – पढ़ने के साथ गुनना अर्थात् हम जो कुछ भी पढ़ते हैं, उस पर गहराई से चिंतन-मनन करना। अध्ययन के द्वारा अपनी रुचियों को विस्तृत, जागृत और परिष्कृत किया जा सकता है, तरह-तरह के विषयों का ज्ञान सहजता से प्राप्त किया जा सकता है, अंधविश्वासों और गलत धारणाओं को मिटाया जा सकता है, आत्मिक शान्ति का लाभ भी पाया जा सकता है। अध्ययन का तात्पर्य पुस्तक में छपी सूचना पढ़कर याद कर लेना नहीं है। अध्ययन के लिए असीमित विषयक्षेत्र हैं – साहित्य, संगीत, विज्ञान, धर्म, दर्शन, मनोरंजन आदि। अध्ययन ने नए क्षितिज का उद्घाटन किया है। यह कहना अतिश्योक्ति न होगा कि अध्ययन – मनन प्रत्येक क्षेत्र की मूल समृद्धि का आधार है। ‘समृद्धि’ का अर्थ है -
  1. Aसंपन्नता
  2. Bसमिधा
  3. Cसम्राज्ञी
  4. Dसम्यक्
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Correct answer: (A) संपन्नता

Explanation

‘समृद्धि’ का अर्थ है धन-धान्य और साधनों से भरपूर होना, अर्थात् संपन्नता।

Q158CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 8 Feb 2026
नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर सबसे सही उत्तर वाले विकल्प का चयन करिए। ‘अध्ययन’ शब्द का सामान्य अर्थ है – पढ़ना और इसका विशिष्ट अर्थ है – पढ़ने के साथ गुनना अर्थात् हम जो कुछ भी पढ़ते हैं, उस पर गहराई से चिंतन-मनन करना। अध्ययन के द्वारा अपनी रुचियों को विस्तृत, जागृत और परिष्कृत किया जा सकता है, तरह-तरह के विषयों का ज्ञान सहजता से प्राप्त किया जा सकता है, अंधविश्वासों और गलत धारणाओं को मिटाया जा सकता है, आत्मिक शान्ति का लाभ भी पाया जा सकता है। अध्ययन का तात्पर्य पुस्तक में छपी सूचना पढ़कर याद कर लेना नहीं है। अध्ययन के लिए असीमित विषयक्षेत्र हैं – साहित्य, संगीत, विज्ञान, धर्म, दर्शन, मनोरंजन आदि। अध्ययन ने नए क्षितिज का उद्घाटन किया है। यह कहना अतिश्योक्ति न होगा कि अध्ययन – मनन प्रत्येक क्षेत्र की मूल समृद्धि का आधार है। अध्ययन के द्वारा क्या प्राप्त किया जा सकता है?
  1. Aरुचियों का विस्तारण।
  2. Bकार्यों का निरीक्षण।
  3. Cसूचनाओं का संग्रहण।
  4. Dअंधविश्वासों का अधिग्रहण।
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Correct answer: (A) रुचियों का विस्तारण।

Explanation

गद्यांश के अनुसार अध्ययन से रुचियों को विस्तृत, जागृत और परिष्कृत किया जा सकता है, इसलिए रुचियों का विस्तारण सही उत्तर है।

Q159CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 8 Feb 2026
नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर सबसे सही उत्तर वाले विकल्प का चयन करिए। ‘अध्ययन’ शब्द का सामान्य अर्थ है – पढ़ना और इसका विशिष्ट अर्थ है – पढ़ने के साथ गुनना अर्थात् हम जो कुछ भी पढ़ते हैं, उस पर गहराई से चिंतन-मनन करना। अध्ययन के द्वारा अपनी रुचियों को विस्तृत, जागृत और परिष्कृत किया जा सकता है, तरह-तरह के विषयों का ज्ञान सहजता से प्राप्त किया जा सकता है, अंधविश्वासों और गलत धारणाओं को मिटाया जा सकता है, आत्मिक शान्ति का लाभ भी पाया जा सकता है। अध्ययन का तात्पर्य पुस्तक में छपी सूचना पढ़कर याद कर लेना नहीं है। अध्ययन के लिए असीमित विषयक्षेत्र हैं – साहित्य, संगीत, विज्ञान, धर्म, दर्शन, मनोरंजन आदि। अध्ययन ने नए क्षितिज का उद्घाटन किया है। यह कहना अतिश्योक्ति न होगा कि अध्ययन – मनन प्रत्येक क्षेत्र की मूल समृद्धि का आधार है। उपसर्ग की दृष्टि से ‘समालोचना’ का विग्रह है -
  1. Aसम + आलोचना
  2. Bसमा + लोचना
  3. Cसम् + आलोचना
  4. Dस + म + आलोचना
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Correct answer: (C) सम् + आलोचना

Explanation

‘समालोचना’ में ‘सम्’ उपसर्ग है: सम् + आलोचना = समालोचना (म् और आ मिलकर ‘मा’ बनाते हैं)।

Q160CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 8 Feb 2026
नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर सबसे सही उत्तर वाले विकल्प का चयन करिए। ‘अध्ययन’ शब्द का सामान्य अर्थ है – पढ़ना और इसका विशिष्ट अर्थ है – पढ़ने के साथ गुनना अर्थात् हम जो कुछ भी पढ़ते हैं, उस पर गहराई से चिंतन-मनन करना। अध्ययन के द्वारा अपनी रुचियों को विस्तृत, जागृत और परिष्कृत किया जा सकता है, तरह-तरह के विषयों का ज्ञान सहजता से प्राप्त किया जा सकता है, अंधविश्वासों और गलत धारणाओं को मिटाया जा सकता है, आत्मिक शान्ति का लाभ भी पाया जा सकता है। अध्ययन का तात्पर्य पुस्तक में छपी सूचना पढ़कर याद कर लेना नहीं है। अध्ययन के लिए असीमित विषयक्षेत्र हैं – साहित्य, संगीत, विज्ञान, धर्म, दर्शन, मनोरंजन आदि। अध्ययन ने नए क्षितिज का उद्घाटन किया है। यह कहना अतिश्योक्ति न होगा कि अध्ययन – मनन प्रत्येक क्षेत्र की मूल समृद्धि का आधार है। ‘पढ़ने के साथ गुनना’ का क्या तात्पर्य है?
  1. Aपढ़े गए पर वक्तव्य तैयार करना।
  2. Bपढ़कर पुनर्लेखन करना।
  3. Cपढ़कर याद कर लेना।
  4. Dपढ़े गए पर चिंतन मनन करना।
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Correct answer: (D) पढ़े गए पर चिंतन मनन करना।

Explanation

गद्यांश में ही बताया गया है कि गुनने का अर्थ है पढ़ी हुई बात पर गहराई से चिंतन-मनन करना।

Q161CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 8 Feb 2026
नीचे दिए गए अनुच्छेद को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए। विज्ञापन का सामान्य अर्थ किसी प्रकार की नयी सूचना को जन-जन तक पहुँचाना है। यह सूचना सरकार द्वारा दी जाने वाली घोषणाएँ भी हो सकती हैं या फिर किसी नव शोधित, उत्पादित या निर्मित वस्तु के प्रचार से भी संबंधित हो सकती है। सामान्य-विशेष सभी तक विज्ञापित करने का काम प्राचीन काल में भी होता था और आज के युग में तो इसकी अनिवार्यता बढ़ती ही जा रही है। ढिंढोरा पीटना, मुनादी करना ये सब विज्ञापन के ही रूप थे। पुस्तकों के प्रकाशन व रेडियो के आविष्कार के साथ विज्ञापन के क्षेत्र में क्रान्ति आई। सभी प्रकार के सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजन, नौकरी, उपलब्धि, यहाँ तक की वर-वधु की खोज यह भी विज्ञापन के क्षेत्र में आ गए हैं। यह कला के साथ-साथ एक व्यवसाय भी बन गया है। पत्र-पत्रिका, रेडियो, टी.वी., फिल्में ये सब विज्ञापन के सशक्त साधन हैं। ‘प्राचीन’ का विलोम है :
  1. Aअधीन
  2. Bभविष्य
  3. Cपरंपरागत
  4. Dनवीन
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Correct answer: (D) नवीन

Explanation

‘प्राचीन’ का अर्थ पुराना है, इसलिए इसका विलोम ‘नवीन’ (नया) है।

Q162CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 8 Feb 2026
नीचे दिए गए अनुच्छेद को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए। विज्ञापन का सामान्य अर्थ किसी प्रकार की नयी सूचना को जन-जन तक पहुँचाना है। यह सूचना सरकार द्वारा दी जाने वाली घोषणाएँ भी हो सकती हैं या फिर किसी नव शोधित, उत्पादित या निर्मित वस्तु के प्रचार से भी संबंधित हो सकती है। सामान्य-विशेष सभी तक विज्ञापित करने का काम प्राचीन काल में भी होता था और आज के युग में तो इसकी अनिवार्यता बढ़ती ही जा रही है। ढिंढोरा पीटना, मुनादी करना ये सब विज्ञापन के ही रूप थे। पुस्तकों के प्रकाशन व रेडियो के आविष्कार के साथ विज्ञापन के क्षेत्र में क्रान्ति आई। सभी प्रकार के सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजन, नौकरी, उपलब्धि, यहाँ तक की वर-वधु की खोज यह भी विज्ञापन के क्षेत्र में आ गए हैं। यह कला के साथ-साथ एक व्यवसाय भी बन गया है। पत्र-पत्रिका, रेडियो, टी.वी., फिल्में ये सब विज्ञापन के सशक्त साधन हैं। गद्यांश के अनुसार कौन-सा वाक्य सही है?
  1. Aविज्ञापन की आवश्यकता घटती जा रही है।
  2. Bसांस्कृतिक आयोजन विज्ञापन की दुनिया से अछूते हैं।
  3. Cविज्ञापन एक आधुनिक कला है।
  4. Dयह कला भी है और एक व्यवसाय भी है।
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Correct answer: (D) यह कला भी है और एक व्यवसाय भी है।

Explanation

गद्यांश में लिखा है कि विज्ञापन कला के साथ-साथ एक व्यवसाय भी बन गया है; बाकी तीनों कथन गद्यांश के विपरीत हैं।

Q163CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 8 Feb 2026
नीचे दिए गए अनुच्छेद को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए। विज्ञापन का सामान्य अर्थ किसी प्रकार की नयी सूचना को जन-जन तक पहुँचाना है। यह सूचना सरकार द्वारा दी जाने वाली घोषणाएँ भी हो सकती हैं या फिर किसी नव शोधित, उत्पादित या निर्मित वस्तु के प्रचार से भी संबंधित हो सकती है। सामान्य-विशेष सभी तक विज्ञापित करने का काम प्राचीन काल में भी होता था और आज के युग में तो इसकी अनिवार्यता बढ़ती ही जा रही है। ढिंढोरा पीटना, मुनादी करना ये सब विज्ञापन के ही रूप थे। पुस्तकों के प्रकाशन व रेडियो के आविष्कार के साथ विज्ञापन के क्षेत्र में क्रान्ति आई। सभी प्रकार के सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजन, नौकरी, उपलब्धि, यहाँ तक की वर-वधु की खोज यह भी विज्ञापन के क्षेत्र में आ गए हैं। यह कला के साथ-साथ एक व्यवसाय भी बन गया है। पत्र-पत्रिका, रेडियो, टी.वी., फिल्में ये सब विज्ञापन के सशक्त साधन हैं। प्राचीन काल में विज्ञापन का क्या स्वरूप था?
  1. Aपत्र-पत्रिकाओं में विज्ञापन छपवाना।
  2. Bमुनादी द्वारा विज्ञापन करवाना।
  3. Cटी.वी. द्वारा विज्ञापन प्रसारित करवाना।
  4. Dरेडियो द्वारा विज्ञापन प्रसारित करवाना।
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Correct answer: (B) मुनादी द्वारा विज्ञापन करवाना।

Explanation

गद्यांश के अनुसार प्राचीन काल में ढिंढोरा पीटना और मुनादी करना ही विज्ञापन के रूप थे; पत्र-पत्रिका, रेडियो और टी.वी. आधुनिक साधन हैं।

Q164CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 8 Feb 2026
नीचे दिए गए अनुच्छेद को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए। विज्ञापन का सामान्य अर्थ किसी प्रकार की नयी सूचना को जन-जन तक पहुँचाना है। यह सूचना सरकार द्वारा दी जाने वाली घोषणाएँ भी हो सकती हैं या फिर किसी नव शोधित, उत्पादित या निर्मित वस्तु के प्रचार से भी संबंधित हो सकती है। सामान्य-विशेष सभी तक विज्ञापित करने का काम प्राचीन काल में भी होता था और आज के युग में तो इसकी अनिवार्यता बढ़ती ही जा रही है। ढिंढोरा पीटना, मुनादी करना ये सब विज्ञापन के ही रूप थे। पुस्तकों के प्रकाशन व रेडियो के आविष्कार के साथ विज्ञापन के क्षेत्र में क्रान्ति आई। सभी प्रकार के सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजन, नौकरी, उपलब्धि, यहाँ तक की वर-वधु की खोज यह भी विज्ञापन के क्षेत्र में आ गए हैं। यह कला के साथ-साथ एक व्यवसाय भी बन गया है। पत्र-पत्रिका, रेडियो, टी.वी., फिल्में ये सब विज्ञापन के सशक्त साधन हैं। ‘विज्ञापन के क्षेत्र में क्रान्ति आई।’ वाक्य से आशय है -
  1. Aविज्ञापन का विषय-क्षेत्र घट रहा है।
  2. Bविज्ञापन की सार्थकता बढ़ गयी है।
  3. Cविज्ञापन के क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन हुआ है।
  4. Dविज्ञापन से लोगों को जानकारी नहीं पहुँच रही है।
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Correct answer: (C) विज्ञापन के क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन हुआ है।

Explanation

‘क्रान्ति आना’ का अर्थ है बहुत बड़ा और अचानक बदलाव होना, अर्थात् विज्ञापन के क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन हुआ।

Q165CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 8 Feb 2026
नीचे दिए गए अनुच्छेद को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए। विज्ञापन का सामान्य अर्थ किसी प्रकार की नयी सूचना को जन-जन तक पहुँचाना है। यह सूचना सरकार द्वारा दी जाने वाली घोषणाएँ भी हो सकती हैं या फिर किसी नव शोधित, उत्पादित या निर्मित वस्तु के प्रचार से भी संबंधित हो सकती है। सामान्य-विशेष सभी तक विज्ञापित करने का काम प्राचीन काल में भी होता था और आज के युग में तो इसकी अनिवार्यता बढ़ती ही जा रही है। ढिंढोरा पीटना, मुनादी करना ये सब विज्ञापन के ही रूप थे। पुस्तकों के प्रकाशन व रेडियो के आविष्कार के साथ विज्ञापन के क्षेत्र में क्रान्ति आई। सभी प्रकार के सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजन, नौकरी, उपलब्धि, यहाँ तक की वर-वधु की खोज यह भी विज्ञापन के क्षेत्र में आ गए हैं। यह कला के साथ-साथ एक व्यवसाय भी बन गया है। पत्र-पत्रिका, रेडियो, टी.वी., फिल्में ये सब विज्ञापन के सशक्त साधन हैं। विज्ञापन का सामान्य अर्थ क्या है?
  1. Aकेवल सामान्य लोगों को जानकारी देना।
  2. Bसभी लोगों को भ्रमित करना।
  3. Cलोगों तक सूचनाएँ पहुँचाना।
  4. Dकेवल विशिष्ट लोगों को संदेश देना।
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Correct answer: (C) लोगों तक सूचनाएँ पहुँचाना।

Explanation

गद्यांश की पहली पंक्ति के अनुसार विज्ञापन का सामान्य अर्थ नई सूचना को जन-जन तक पहुँचाना है।

Q166CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 8 Feb 2026
नीचे दिए गए अनुच्छेद को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए। विज्ञापन का सामान्य अर्थ किसी प्रकार की नयी सूचना को जन-जन तक पहुँचाना है। यह सूचना सरकार द्वारा दी जाने वाली घोषणाएँ भी हो सकती हैं या फिर किसी नव शोधित, उत्पादित या निर्मित वस्तु के प्रचार से भी संबंधित हो सकती है। सामान्य-विशेष सभी तक विज्ञापित करने का काम प्राचीन काल में भी होता था और आज के युग में तो इसकी अनिवार्यता बढ़ती ही जा रही है। ढिंढोरा पीटना, मुनादी करना ये सब विज्ञापन के ही रूप थे। पुस्तकों के प्रकाशन व रेडियो के आविष्कार के साथ विज्ञापन के क्षेत्र में क्रान्ति आई। सभी प्रकार के सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजन, नौकरी, उपलब्धि, यहाँ तक की वर-वधु की खोज यह भी विज्ञापन के क्षेत्र में आ गए हैं। यह कला के साथ-साथ एक व्यवसाय भी बन गया है। पत्र-पत्रिका, रेडियो, टी.वी., फिल्में ये सब विज्ञापन के सशक्त साधन हैं। प्रत्यय की दृष्टि से कौन-सा शब्द भिन्न है?
  1. Aललित
  2. Bशोधित
  3. Cउत्पादित
  4. Dनिर्मित
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Correct answer: (A) ललित

Explanation

शोधित, उत्पादित और निर्मित में ‘इत’ प्रत्यय जुड़ा है (शोध + इत, उत्पाद + इत, निर्माण से निर्मित), जबकि ‘ललित’ स्वयं में मूल शब्द है, इसलिए वह भिन्न है।

Q167CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 8 Feb 2026
नीचे दिए गए अनुच्छेद को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए। विज्ञापन का सामान्य अर्थ किसी प्रकार की नयी सूचना को जन-जन तक पहुँचाना है। यह सूचना सरकार द्वारा दी जाने वाली घोषणाएँ भी हो सकती हैं या फिर किसी नव शोधित, उत्पादित या निर्मित वस्तु के प्रचार से भी संबंधित हो सकती है। सामान्य-विशेष सभी तक विज्ञापित करने का काम प्राचीन काल में भी होता था और आज के युग में तो इसकी अनिवार्यता बढ़ती ही जा रही है। ढिंढोरा पीटना, मुनादी करना ये सब विज्ञापन के ही रूप थे। पुस्तकों के प्रकाशन व रेडियो के आविष्कार के साथ विज्ञापन के क्षेत्र में क्रान्ति आई। सभी प्रकार के सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजन, नौकरी, उपलब्धि, यहाँ तक की वर-वधु की खोज यह भी विज्ञापन के क्षेत्र में आ गए हैं। यह कला के साथ-साथ एक व्यवसाय भी बन गया है। पत्र-पत्रिका, रेडियो, टी.वी., फिल्में ये सब विज्ञापन के सशक्त साधन हैं। गद्यांश में विज्ञापन के किस स्वरूप का उल्लेख नहीं हुआ है?
  1. Aभित्ति लेखन
  2. Bरेडियो
  3. Cपत्र-पत्रिका
  4. Dटी.वी.
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Correct answer: (A) भित्ति लेखन

Explanation

गद्यांश में रेडियो, पत्र-पत्रिका, टी.वी. और फिल्मों का उल्लेख है, पर भित्ति लेखन (दीवार पर लिखना) का नहीं।

Q168CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 8 Feb 2026
निम्नलिखित कार्य को क्या कहा जाएगा? एक संक्षिप्त पाठ्यवस्तु के छोटे 2 खंड या प्रत्येक एक पंक्ति छोड़कर दूसरी पंक्ति शिक्षार्थियों को दो-दो के जोड़ों में दी जाती है। प्रत्येक शिक्षार्थी ने इसे अपने साथी को पढ़कर सुनाना है (डिक्टेट) और दूसरे ने लिखना है। फिर इस प्रक्रिया का विपरीतकरण होता है, दूसरा व्यक्ति सुनता है और पहला लिखता है और बाद में पाठ्य सामग्री को अन्तिम स्वरूप देने के लिए दोनों साथ मिलकर कार्य करते हैं।
  1. Aपारस्परिक श्रुतलेख
  2. Bव्याकरण श्रुतलेख
  3. Cप्रतिलेखन (ट्रांसक्रियेशन)
  4. Dअनुच्छेद श्रुतलेख
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Correct answer: (A) पारस्परिक श्रुतलेख

Explanation

इसमें दो साथी बारी-बारी से एक-दूसरे को पाठ बोलकर लिखवाते हैं और फिर मिलकर पूरा पाठ बनाते हैं; इसे पारस्परिक श्रुतलेख (म्यूचुअल डिक्टेशन) कहते हैं।

Q169CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 7 Feb 2026
नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर प्रश्न के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए : यह बात ध्यान देने की है कि ईर्ष्या व्यक्ति-विशेष से होती है। यह नहीं होता कि जिस किसी को ऐश्वर्य, गुण या मन से सम्पन्न देखा उसी से ईर्ष्या हो गई। ईर्ष्या उन्हीं से होती है जिनके विषय में यह धारणा होती है कि लोगों की दृष्टि हमारे साथ-साथ उन पर भी अवश्य पड़ती होगी। अपने से दूरस्थ होने के कारण अपने साथ-साथ जिन पर लोगों का ध्यान जाने का निश्चय नहीं होता उनके प्रति ईर्ष्या नहीं उत्पन्न होती। काशी में रहने वाली किसी धानी को अमेरिका के किसी धानी की बात सुनकर ईर्ष्या नहीं होगी। हिन्दी के किसी कवि को इटली के किसी कवि का महत्त्व सुनकर ईर्ष्या नहीं होगी। संबंधियों, बालसखाओं, सहपाठियों और पड़ोसियों के बीच ईर्ष्या का विकास अधिक देखा जाता है। लड़कपन से जो आदमी एक साथ उठते-बैठते देखे गए हैं उन्हीं में से कोई एक-दूसरे की बढ़ती से जलता हुआ भी पाया गया है। यदि दो साथियों में से कोई किसी अच्छे पद पर पहुँच गया तो वह इस उद्योग में देखा जाता है कि दूसरा किसी अच्छे पद पर न पहुँचने पाए। प्रायः अपनी उन्नति के गुप्त बाधकों का पता लगाते-लगाते लोग अपने किसी बड़े पुराने मित्र तक पहुँच जाते हैं। जिस समय संसर्ग सूत्र में बाँधकर हम औरों को अपने साथ एक पंक्ति में खड़ा करते हैं उस समय सहानुभूति, सहायता आदि की संभावना प्रतिष्ठित होने के साथ ही साथ ईर्ष्या और द्वेष की संभावना की नींव भी पड़ जाती है। अपने किसी विधान से हम भलाई ही भलाई की संभावना का सूत्रपात करें और इस प्रकार भविष्य के अनिश्चय में बाधा डालें, यह कभी हो ही नहीं सकता। भविष्य की अनिश्चयात्मकता अटल और अजेय है। अपनी लाख विद्या-बुद्धि से भी हम उसे बिलकुल हटा नहीं सकते। अब ध्यान देने की बात यह निकली कि ईर्ष्या के संचार के लिए ईर्ष्या करने वाले और ईर्ष्या के पात्र के अतिरिक्त स्थिति पर ध्यान देने वाले समाज की भी आवश्यकता है। इसी समाज की धारणा पर प्रभाव डालने के लिए ही ईर्ष्या की जाती है; ऐश्वर्य, गुण या मन का गुप्त रूप से बिना किसी समुदाय को विदित कराए, सुख या संतोष भोगने के लिए नहीं। हम ईर्ष्या किससे करते हैं?
  1. Aजिन्हें लोग हमारे साथ खेलता देखते हैं
  2. Bजिन्हें लोग हमारे साथ पढ़ता देखते हैं
  3. Cजिन पर लोगों की हमारे साथ दृष्टि पड़ती है
  4. Dजिन्हें लोग हमारे साथ नौकरी करते देखते हैं
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Correct answer: (C) जिन पर लोगों की हमारे साथ दृष्टि पड़ती है

Explanation

गद्यांश के अनुसार ईर्ष्या उन्हीं से होती है जिनके बारे में हमें लगता है कि लोगों की दृष्टि हमारे साथ-साथ उन पर भी अवश्य पड़ती होगी। इसलिए विकल्प (3) सही है।

Q170CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 7 Feb 2026
नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर प्रश्न के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए : यह बात ध्यान देने की है कि ईर्ष्या व्यक्ति-विशेष से होती है। यह नहीं होता कि जिस किसी को ऐश्वर्य, गुण या मन से सम्पन्न देखा उसी से ईर्ष्या हो गई। ईर्ष्या उन्हीं से होती है जिनके विषय में यह धारणा होती है कि लोगों की दृष्टि हमारे साथ-साथ उन पर भी अवश्य पड़ती होगी। अपने से दूरस्थ होने के कारण अपने साथ-साथ जिन पर लोगों का ध्यान जाने का निश्चय नहीं होता उनके प्रति ईर्ष्या नहीं उत्पन्न होती। काशी में रहने वाली किसी धानी को अमेरिका के किसी धानी की बात सुनकर ईर्ष्या नहीं होगी। हिन्दी के किसी कवि को इटली के किसी कवि का महत्त्व सुनकर ईर्ष्या नहीं होगी। संबंधियों, बालसखाओं, सहपाठियों और पड़ोसियों के बीच ईर्ष्या का विकास अधिक देखा जाता है। लड़कपन से जो आदमी एक साथ उठते-बैठते देखे गए हैं उन्हीं में से कोई एक-दूसरे की बढ़ती से जलता हुआ भी पाया गया है। यदि दो साथियों में से कोई किसी अच्छे पद पर पहुँच गया तो वह इस उद्योग में देखा जाता है कि दूसरा किसी अच्छे पद पर न पहुँचने पाए। प्रायः अपनी उन्नति के गुप्त बाधकों का पता लगाते-लगाते लोग अपने किसी बड़े पुराने मित्र तक पहुँच जाते हैं। जिस समय संसर्ग सूत्र में बाँधकर हम औरों को अपने साथ एक पंक्ति में खड़ा करते हैं उस समय सहानुभूति, सहायता आदि की संभावना प्रतिष्ठित होने के साथ ही साथ ईर्ष्या और द्वेष की संभावना की नींव भी पड़ जाती है। अपने किसी विधान से हम भलाई ही भलाई की संभावना का सूत्रपात करें और इस प्रकार भविष्य के अनिश्चय में बाधा डालें, यह कभी हो ही नहीं सकता। भविष्य की अनिश्चयात्मकता अटल और अजेय है। अपनी लाख विद्या-बुद्धि से भी हम उसे बिलकुल हटा नहीं सकते। अब ध्यान देने की बात यह निकली कि ईर्ष्या के संचार के लिए ईर्ष्या करने वाले और ईर्ष्या के पात्र के अतिरिक्त स्थिति पर ध्यान देने वाले समाज की भी आवश्यकता है। इसी समाज की धारणा पर प्रभाव डालने के लिए ही ईर्ष्या की जाती है; ऐश्वर्य, गुण या मन का गुप्त रूप से बिना किसी समुदाय को विदित कराए, सुख या संतोष भोगने के लिए नहीं। _____ के बीच ईर्ष्या नहीं फूलती-फलती।
  1. Aसहपाठियों
  2. Bपड़ोसियों
  3. Cदूर रहने वालों
  4. Dरिश्तेदारों
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Correct answer: (C) दूर रहने वालों

Explanation

गद्यांश में कहा गया है कि जो लोग हमसे दूर हैं (जैसे अमेरिका का धनी या इटली का कवि) उनसे ईर्ष्या नहीं होती, जबकि संबंधियों, सहपाठियों और पड़ोसियों में ईर्ष्या अधिक बढ़ती है। अतः दूर रहने वालों के बीच ईर्ष्या नहीं फूलती-फलती।

Q171CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 7 Feb 2026
नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर प्रश्न के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए : यह बात ध्यान देने की है कि ईर्ष्या व्यक्ति-विशेष से होती है। यह नहीं होता कि जिस किसी को ऐश्वर्य, गुण या मन से सम्पन्न देखा उसी से ईर्ष्या हो गई। ईर्ष्या उन्हीं से होती है जिनके विषय में यह धारणा होती है कि लोगों की दृष्टि हमारे साथ-साथ उन पर भी अवश्य पड़ती होगी। अपने से दूरस्थ होने के कारण अपने साथ-साथ जिन पर लोगों का ध्यान जाने का निश्चय नहीं होता उनके प्रति ईर्ष्या नहीं उत्पन्न होती। काशी में रहने वाली किसी धानी को अमेरिका के किसी धानी की बात सुनकर ईर्ष्या नहीं होगी। हिन्दी के किसी कवि को इटली के किसी कवि का महत्त्व सुनकर ईर्ष्या नहीं होगी। संबंधियों, बालसखाओं, सहपाठियों और पड़ोसियों के बीच ईर्ष्या का विकास अधिक देखा जाता है। लड़कपन से जो आदमी एक साथ उठते-बैठते देखे गए हैं उन्हीं में से कोई एक-दूसरे की बढ़ती से जलता हुआ भी पाया गया है। यदि दो साथियों में से कोई किसी अच्छे पद पर पहुँच गया तो वह इस उद्योग में देखा जाता है कि दूसरा किसी अच्छे पद पर न पहुँचने पाए। प्रायः अपनी उन्नति के गुप्त बाधकों का पता लगाते-लगाते लोग अपने किसी बड़े पुराने मित्र तक पहुँच जाते हैं। जिस समय संसर्ग सूत्र में बाँधकर हम औरों को अपने साथ एक पंक्ति में खड़ा करते हैं उस समय सहानुभूति, सहायता आदि की संभावना प्रतिष्ठित होने के साथ ही साथ ईर्ष्या और द्वेष की संभावना की नींव भी पड़ जाती है। अपने किसी विधान से हम भलाई ही भलाई की संभावना का सूत्रपात करें और इस प्रकार भविष्य के अनिश्चय में बाधा डालें, यह कभी हो ही नहीं सकता। भविष्य की अनिश्चयात्मकता अटल और अजेय है। अपनी लाख विद्या-बुद्धि से भी हम उसे बिलकुल हटा नहीं सकते। अब ध्यान देने की बात यह निकली कि ईर्ष्या के संचार के लिए ईर्ष्या करने वाले और ईर्ष्या के पात्र के अतिरिक्त स्थिति पर ध्यान देने वाले समाज की भी आवश्यकता है। इसी समाज की धारणा पर प्रभाव डालने के लिए ही ईर्ष्या की जाती है; ऐश्वर्य, गुण या मन का गुप्त रूप से बिना किसी समुदाय को विदित कराए, सुख या संतोष भोगने के लिए नहीं। किसी परिचित के प्रतिष्ठित हो जाने से
  1. Aउसके विकास को रोकने का मन करता है
  2. Bहमें कोई फर्क नहीं पड़ता है
  3. Cहम उसे पहले से अधिक इज्जत देते हैं
  4. Dईर्ष्या और द्वेष की नींव पड़ती है
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Correct answer: (D) ईर्ष्या और द्वेष की नींव पड़ती है

Explanation

गद्यांश के अनुसार जब हम दूसरों को अपने साथ एक पंक्ति में खड़ा करते हैं तो सहानुभूति के साथ-साथ ईर्ष्या और द्वेष की संभावना की नींव भी पड़ जाती है। परिचित के प्रतिष्ठित होने पर यही होता है।

Q172CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 7 Feb 2026
नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर प्रश्न के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए : यह बात ध्यान देने की है कि ईर्ष्या व्यक्ति-विशेष से होती है। यह नहीं होता कि जिस किसी को ऐश्वर्य, गुण या मन से सम्पन्न देखा उसी से ईर्ष्या हो गई। ईर्ष्या उन्हीं से होती है जिनके विषय में यह धारणा होती है कि लोगों की दृष्टि हमारे साथ-साथ उन पर भी अवश्य पड़ती होगी। अपने से दूरस्थ होने के कारण अपने साथ-साथ जिन पर लोगों का ध्यान जाने का निश्चय नहीं होता उनके प्रति ईर्ष्या नहीं उत्पन्न होती। काशी में रहने वाली किसी धानी को अमेरिका के किसी धानी की बात सुनकर ईर्ष्या नहीं होगी। हिन्दी के किसी कवि को इटली के किसी कवि का महत्त्व सुनकर ईर्ष्या नहीं होगी। संबंधियों, बालसखाओं, सहपाठियों और पड़ोसियों के बीच ईर्ष्या का विकास अधिक देखा जाता है। लड़कपन से जो आदमी एक साथ उठते-बैठते देखे गए हैं उन्हीं में से कोई एक-दूसरे की बढ़ती से जलता हुआ भी पाया गया है। यदि दो साथियों में से कोई किसी अच्छे पद पर पहुँच गया तो वह इस उद्योग में देखा जाता है कि दूसरा किसी अच्छे पद पर न पहुँचने पाए। प्रायः अपनी उन्नति के गुप्त बाधकों का पता लगाते-लगाते लोग अपने किसी बड़े पुराने मित्र तक पहुँच जाते हैं। जिस समय संसर्ग सूत्र में बाँधकर हम औरों को अपने साथ एक पंक्ति में खड़ा करते हैं उस समय सहानुभूति, सहायता आदि की संभावना प्रतिष्ठित होने के साथ ही साथ ईर्ष्या और द्वेष की संभावना की नींव भी पड़ जाती है। अपने किसी विधान से हम भलाई ही भलाई की संभावना का सूत्रपात करें और इस प्रकार भविष्य के अनिश्चय में बाधा डालें, यह कभी हो ही नहीं सकता। भविष्य की अनिश्चयात्मकता अटल और अजेय है। अपनी लाख विद्या-बुद्धि से भी हम उसे बिलकुल हटा नहीं सकते। अब ध्यान देने की बात यह निकली कि ईर्ष्या के संचार के लिए ईर्ष्या करने वाले और ईर्ष्या के पात्र के अतिरिक्त स्थिति पर ध्यान देने वाले समाज की भी आवश्यकता है। इसी समाज की धारणा पर प्रभाव डालने के लिए ही ईर्ष्या की जाती है; ऐश्वर्य, गुण या मन का गुप्त रूप से बिना किसी समुदाय को विदित कराए, सुख या संतोष भोगने के लिए नहीं। ईर्ष्या पैदा करने के लिए आवश्यक नहीं है
  1. Aईर्ष्या करने वाला
  2. Bकिसी का ऐश्वर्य
  3. Cईर्ष्या का पात्र
  4. Dस्थिति पर ध्यान देने वाला समाज
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Correct answer: (B) किसी का ऐश्वर्य

Explanation

गद्यांश के अनुसार ईर्ष्या के लिए तीन चीज़ें आवश्यक हैं: ईर्ष्या करने वाला, ईर्ष्या का पात्र और स्थिति पर ध्यान देने वाला समाज। 'किसी का ऐश्वर्य' इनमें आवश्यक शर्त के रूप में नहीं गिनाया गया है।

Q173CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 7 Feb 2026
नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर प्रश्न के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए : यह बात ध्यान देने की है कि ईर्ष्या व्यक्ति-विशेष से होती है। यह नहीं होता कि जिस किसी को ऐश्वर्य, गुण या मन से सम्पन्न देखा उसी से ईर्ष्या हो गई। ईर्ष्या उन्हीं से होती है जिनके विषय में यह धारणा होती है कि लोगों की दृष्टि हमारे साथ-साथ उन पर भी अवश्य पड़ती होगी। अपने से दूरस्थ होने के कारण अपने साथ-साथ जिन पर लोगों का ध्यान जाने का निश्चय नहीं होता उनके प्रति ईर्ष्या नहीं उत्पन्न होती। काशी में रहने वाली किसी धानी को अमेरिका के किसी धानी की बात सुनकर ईर्ष्या नहीं होगी। हिन्दी के किसी कवि को इटली के किसी कवि का महत्त्व सुनकर ईर्ष्या नहीं होगी। संबंधियों, बालसखाओं, सहपाठियों और पड़ोसियों के बीच ईर्ष्या का विकास अधिक देखा जाता है। लड़कपन से जो आदमी एक साथ उठते-बैठते देखे गए हैं उन्हीं में से कोई एक-दूसरे की बढ़ती से जलता हुआ भी पाया गया है। यदि दो साथियों में से कोई किसी अच्छे पद पर पहुँच गया तो वह इस उद्योग में देखा जाता है कि दूसरा किसी अच्छे पद पर न पहुँचने पाए। प्रायः अपनी उन्नति के गुप्त बाधकों का पता लगाते-लगाते लोग अपने किसी बड़े पुराने मित्र तक पहुँच जाते हैं। जिस समय संसर्ग सूत्र में बाँधकर हम औरों को अपने साथ एक पंक्ति में खड़ा करते हैं उस समय सहानुभूति, सहायता आदि की संभावना प्रतिष्ठित होने के साथ ही साथ ईर्ष्या और द्वेष की संभावना की नींव भी पड़ जाती है। अपने किसी विधान से हम भलाई ही भलाई की संभावना का सूत्रपात करें और इस प्रकार भविष्य के अनिश्चय में बाधा डालें, यह कभी हो ही नहीं सकता। भविष्य की अनिश्चयात्मकता अटल और अजेय है। अपनी लाख विद्या-बुद्धि से भी हम उसे बिलकुल हटा नहीं सकते। अब ध्यान देने की बात यह निकली कि ईर्ष्या के संचार के लिए ईर्ष्या करने वाले और ईर्ष्या के पात्र के अतिरिक्त स्थिति पर ध्यान देने वाले समाज की भी आवश्यकता है। इसी समाज की धारणा पर प्रभाव डालने के लिए ही ईर्ष्या की जाती है; ऐश्वर्य, गुण या मन का गुप्त रूप से बिना किसी समुदाय को विदित कराए, सुख या संतोष भोगने के लिए नहीं। ‘सूत्रपात करना’ का आशय है
  1. Aबहुत प्रयत्न करना
  2. Bकुछ न करना
  3. Cप्रारम्भ करना
  4. Dसमाप्त करना
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Correct answer: (C) प्रारम्भ करना

Explanation

'सूत्रपात करना' का अर्थ है किसी काम की शुरुआत करना, अर्थात् प्रारम्भ करना।

Q174CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 7 Feb 2026
नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर प्रश्न के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए : यह बात ध्यान देने की है कि ईर्ष्या व्यक्ति-विशेष से होती है। यह नहीं होता कि जिस किसी को ऐश्वर्य, गुण या मन से सम्पन्न देखा उसी से ईर्ष्या हो गई। ईर्ष्या उन्हीं से होती है जिनके विषय में यह धारणा होती है कि लोगों की दृष्टि हमारे साथ-साथ उन पर भी अवश्य पड़ती होगी। अपने से दूरस्थ होने के कारण अपने साथ-साथ जिन पर लोगों का ध्यान जाने का निश्चय नहीं होता उनके प्रति ईर्ष्या नहीं उत्पन्न होती। काशी में रहने वाली किसी धानी को अमेरिका के किसी धानी की बात सुनकर ईर्ष्या नहीं होगी। हिन्दी के किसी कवि को इटली के किसी कवि का महत्त्व सुनकर ईर्ष्या नहीं होगी। संबंधियों, बालसखाओं, सहपाठियों और पड़ोसियों के बीच ईर्ष्या का विकास अधिक देखा जाता है। लड़कपन से जो आदमी एक साथ उठते-बैठते देखे गए हैं उन्हीं में से कोई एक-दूसरे की बढ़ती से जलता हुआ भी पाया गया है। यदि दो साथियों में से कोई किसी अच्छे पद पर पहुँच गया तो वह इस उद्योग में देखा जाता है कि दूसरा किसी अच्छे पद पर न पहुँचने पाए। प्रायः अपनी उन्नति के गुप्त बाधकों का पता लगाते-लगाते लोग अपने किसी बड़े पुराने मित्र तक पहुँच जाते हैं। जिस समय संसर्ग सूत्र में बाँधकर हम औरों को अपने साथ एक पंक्ति में खड़ा करते हैं उस समय सहानुभूति, सहायता आदि की संभावना प्रतिष्ठित होने के साथ ही साथ ईर्ष्या और द्वेष की संभावना की नींव भी पड़ जाती है। अपने किसी विधान से हम भलाई ही भलाई की संभावना का सूत्रपात करें और इस प्रकार भविष्य के अनिश्चय में बाधा डालें, यह कभी हो ही नहीं सकता। भविष्य की अनिश्चयात्मकता अटल और अजेय है। अपनी लाख विद्या-बुद्धि से भी हम उसे बिलकुल हटा नहीं सकते। अब ध्यान देने की बात यह निकली कि ईर्ष्या के संचार के लिए ईर्ष्या करने वाले और ईर्ष्या के पात्र के अतिरिक्त स्थिति पर ध्यान देने वाले समाज की भी आवश्यकता है। इसी समाज की धारणा पर प्रभाव डालने के लिए ही ईर्ष्या की जाती है; ऐश्वर्य, गुण या मन का गुप्त रूप से बिना किसी समुदाय को विदित कराए, सुख या संतोष भोगने के लिए नहीं। लड़कपन के साथी की बढ़ती से कोई
  1. Aजलता है
  2. Bखुश होता है
  3. Cद्वेष करता है
  4. Dसुखी होता है
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Correct answer: (A) जलता है

Explanation

गद्यांश में कहा गया है कि लड़कपन से साथ उठने-बैठने वालों में से कोई एक-दूसरे की बढ़ती से जलता हुआ भी पाया गया है। अतः सही उत्तर 'जलता है' है।

Q175CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 7 Feb 2026
नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर प्रश्न के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए : यह बात ध्यान देने की है कि ईर्ष्या व्यक्ति-विशेष से होती है। यह नहीं होता कि जिस किसी को ऐश्वर्य, गुण या मन से सम्पन्न देखा उसी से ईर्ष्या हो गई। ईर्ष्या उन्हीं से होती है जिनके विषय में यह धारणा होती है कि लोगों की दृष्टि हमारे साथ-साथ उन पर भी अवश्य पड़ती होगी। अपने से दूरस्थ होने के कारण अपने साथ-साथ जिन पर लोगों का ध्यान जाने का निश्चय नहीं होता उनके प्रति ईर्ष्या नहीं उत्पन्न होती। काशी में रहने वाली किसी धानी को अमेरिका के किसी धानी की बात सुनकर ईर्ष्या नहीं होगी। हिन्दी के किसी कवि को इटली के किसी कवि का महत्त्व सुनकर ईर्ष्या नहीं होगी। संबंधियों, बालसखाओं, सहपाठियों और पड़ोसियों के बीच ईर्ष्या का विकास अधिक देखा जाता है। लड़कपन से जो आदमी एक साथ उठते-बैठते देखे गए हैं उन्हीं में से कोई एक-दूसरे की बढ़ती से जलता हुआ भी पाया गया है। यदि दो साथियों में से कोई किसी अच्छे पद पर पहुँच गया तो वह इस उद्योग में देखा जाता है कि दूसरा किसी अच्छे पद पर न पहुँचने पाए। प्रायः अपनी उन्नति के गुप्त बाधकों का पता लगाते-लगाते लोग अपने किसी बड़े पुराने मित्र तक पहुँच जाते हैं। जिस समय संसर्ग सूत्र में बाँधकर हम औरों को अपने साथ एक पंक्ति में खड़ा करते हैं उस समय सहानुभूति, सहायता आदि की संभावना प्रतिष्ठित होने के साथ ही साथ ईर्ष्या और द्वेष की संभावना की नींव भी पड़ जाती है। अपने किसी विधान से हम भलाई ही भलाई की संभावना का सूत्रपात करें और इस प्रकार भविष्य के अनिश्चय में बाधा डालें, यह कभी हो ही नहीं सकता। भविष्य की अनिश्चयात्मकता अटल और अजेय है। अपनी लाख विद्या-बुद्धि से भी हम उसे बिलकुल हटा नहीं सकते। अब ध्यान देने की बात यह निकली कि ईर्ष्या के संचार के लिए ईर्ष्या करने वाले और ईर्ष्या के पात्र के अतिरिक्त स्थिति पर ध्यान देने वाले समाज की भी आवश्यकता है। इसी समाज की धारणा पर प्रभाव डालने के लिए ही ईर्ष्या की जाती है; ऐश्वर्य, गुण या मन का गुप्त रूप से बिना किसी समुदाय को विदित कराए, सुख या संतोष भोगने के लिए नहीं। ‘पड़ोसियों’ पड़ोसी संज्ञा का _____ रूप है।
  1. Aसामान्य एकवचन
  2. Bसामान्य बहुवचन
  3. Cतिर्यक बहुवचन
  4. Dतिर्यक एकवचन
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Correct answer: (C) तिर्यक बहुवचन

Explanation

'पड़ोसियों' में 'ओं' विभक्ति-योग्य (परसर्ग से पहले आने वाला) बहुवचन रूप है, जैसे 'पड़ोसियों के बीच'। इसे तिर्यक बहुवचन कहते हैं; सामान्य (मूल) बहुवचन 'पड़ोसी' ही रहता है।

Q176CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 7 Feb 2026
नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर प्रश्न के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए : यह बात ध्यान देने की है कि ईर्ष्या व्यक्ति-विशेष से होती है। यह नहीं होता कि जिस किसी को ऐश्वर्य, गुण या मन से सम्पन्न देखा उसी से ईर्ष्या हो गई। ईर्ष्या उन्हीं से होती है जिनके विषय में यह धारणा होती है कि लोगों की दृष्टि हमारे साथ-साथ उन पर भी अवश्य पड़ती होगी। अपने से दूरस्थ होने के कारण अपने साथ-साथ जिन पर लोगों का ध्यान जाने का निश्चय नहीं होता उनके प्रति ईर्ष्या नहीं उत्पन्न होती। काशी में रहने वाली किसी धानी को अमेरिका के किसी धानी की बात सुनकर ईर्ष्या नहीं होगी। हिन्दी के किसी कवि को इटली के किसी कवि का महत्त्व सुनकर ईर्ष्या नहीं होगी। संबंधियों, बालसखाओं, सहपाठियों और पड़ोसियों के बीच ईर्ष्या का विकास अधिक देखा जाता है। लड़कपन से जो आदमी एक साथ उठते-बैठते देखे गए हैं उन्हीं में से कोई एक-दूसरे की बढ़ती से जलता हुआ भी पाया गया है। यदि दो साथियों में से कोई किसी अच्छे पद पर पहुँच गया तो वह इस उद्योग में देखा जाता है कि दूसरा किसी अच्छे पद पर न पहुँचने पाए। प्रायः अपनी उन्नति के गुप्त बाधकों का पता लगाते-लगाते लोग अपने किसी बड़े पुराने मित्र तक पहुँच जाते हैं। जिस समय संसर्ग सूत्र में बाँधकर हम औरों को अपने साथ एक पंक्ति में खड़ा करते हैं उस समय सहानुभूति, सहायता आदि की संभावना प्रतिष्ठित होने के साथ ही साथ ईर्ष्या और द्वेष की संभावना की नींव भी पड़ जाती है। अपने किसी विधान से हम भलाई ही भलाई की संभावना का सूत्रपात करें और इस प्रकार भविष्य के अनिश्चय में बाधा डालें, यह कभी हो ही नहीं सकता। भविष्य की अनिश्चयात्मकता अटल और अजेय है। अपनी लाख विद्या-बुद्धि से भी हम उसे बिलकुल हटा नहीं सकते। अब ध्यान देने की बात यह निकली कि ईर्ष्या के संचार के लिए ईर्ष्या करने वाले और ईर्ष्या के पात्र के अतिरिक्त स्थिति पर ध्यान देने वाले समाज की भी आवश्यकता है। इसी समाज की धारणा पर प्रभाव डालने के लिए ही ईर्ष्या की जाती है; ऐश्वर्य, गुण या मन का गुप्त रूप से बिना किसी समुदाय को विदित कराए, सुख या संतोष भोगने के लिए नहीं। उन्नति के गुप्त बाधक को खोजने पर हमें क्या पता चलता है?
  1. Aवह सहपाठी था
  2. Bवह बालसखा था
  3. Cवह पड़ोसी था
  4. Dवह पुराना मित्र था
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Correct answer: (D) वह पुराना मित्र था

Explanation

गद्यांश के अनुसार अपनी उन्नति के गुप्त बाधकों का पता लगाते-लगाते लोग अपने किसी बड़े पुराने मित्र तक पहुँच जाते हैं। अतः बाधक पुराना मित्र निकलता है।

Q177CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 7 Feb 2026
नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर प्रश्न के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए : समाज में पड़ते ही मनुष्य देखने लगता है कि उसकी स्थिति दोहरी हो गई है। वह देखता है कि मैं यह हूँ, और मैं बड़ा समझा जाता हूँ। इस निश्चय के साथ एक यह निश्चय और जुड़ जाने से कि मैं बड़ा समझा जाता हूँ मनुष्य के आनंद या सुख के अनुभव में वृद्धि होती है। इसी प्रकार मैं क्षुद्र हूँ इस धारणा के साथ मैं क्षुद्र समझा जाता हूँ इस धारणा के योग से दुःख के अनुभव की वृद्धि होती है। इस प्रकार स्थिति के एकांत और सामाजिक दो विभाग हो जाने से कोई तो दोनों विभागों पर दृष्टि रख सकते हैं और कोई एक ही पर। शक्तिशाली और प्रतिभा सम्पन्न मनुष्य पहले यह प्रयत्न करते हैं कि ‘हम ऐसे हों’। फिर वैसे हो जाने पर यदि आवश्यक हुआ तो वे यह प्रयत्न भी करते हैं कि ‘हम ऐसे समझे जाएँ’। इन दोनों के प्रयत्न जुदा-जुदा हैं। संसार में शक्ति सम्पन्न सब नहीं होते, इससे बहुत से लोग स्थिति के पहले विभाग के लिए जिन प्रयत्नों की आवश्यकता है उनमें अपने को असमर्थ देख दूसरे ही विभाग से किसी प्रकार अपना संतोष करना चाहते हैं और उसी पर दृष्टि रखकर प्रयत्न करते हैं। ईर्ष्या ऐसे लोगों के हृदय में बहुत जगह पाती है और उनके प्रयत्नों में सहायक भी होती है। भाव प्रवर्तन आदि के बल से जिस समुदाय के प्राणी परस्पर ऐसे बन गए हैं कि अपने इंद्रियानुभव और भावनाओं तक को जवाब देकर दूसरों के इंद्रियानुभव और भावनाओं द्वारा निर्वाह कर सकते हैं, उसी से ईर्ष्या का विकास हो सकता है। अतः ईर्ष्या का अनन्य अधिकार मनुष्य जाति ही पर है। एक कुत्ता किसी दूसरे कुत्तों को कुछ खाते देख उसे आप खाने की इच्छा कर सकता है, पर वह यह नहीं चाह सकता कि चाहे हम खाएँ या न खाएँ वह दूसरा कुत्ता न खाने पाए। दूसरे कुत्तों की दृष्टि में हमारी स्थिति कैसी है, इसकी चिंता उस कुत्ते को न होगी। अपने विषय में दूसरों के चित्त में अच्छी धारणा उत्पन्न करने का प्रयत्न अच्छी बात है। इस प्रयत्न को जो बुरा रूप प्राप्त होता है वह असत्य के समावेश के कारण, दूसरों की धारणा की अवास्तविकता और अपनी स्थिति की सापेक्षता के कारण, जब हम अपने विषय में दूसरों की झूठी धारणा और अपनी स्थिति के सापेक्ष रूप मात्र से संतोष करना चाहते हैं तभी बुराइयों के लिए जगह होती है और ईर्ष्या की राह खुलती है। मनुष्य का दुःख बढ़ने का कारण है
  1. Aलोग मुझे कुछ नहीं समझते
  2. Bमैं जैसा हूँ उससे कम समझा जाता हूँ
  3. Cमैं जैसा हूँ वैसा ही समझा जाता हूँ
  4. Dमैं समझा ही नहीं जाता हूँ
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Correct answer: (B) मैं जैसा हूँ उससे कम समझा जाता हूँ

Explanation

गद्यांश के अनुसार 'मैं क्षुद्र हूँ' के साथ 'मैं क्षुद्र समझा जाता हूँ' की धारणा जुड़ने से दुःख बढ़ता है, यानी जब व्यक्ति को लगता है कि वह जैसा है उससे कम समझा जाता है।

Q178CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 7 Feb 2026
नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर प्रश्न के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए : समाज में पड़ते ही मनुष्य देखने लगता है कि उसकी स्थिति दोहरी हो गई है। वह देखता है कि मैं यह हूँ, और मैं बड़ा समझा जाता हूँ। इस निश्चय के साथ एक यह निश्चय और जुड़ जाने से कि मैं बड़ा समझा जाता हूँ मनुष्य के आनंद या सुख के अनुभव में वृद्धि होती है। इसी प्रकार मैं क्षुद्र हूँ इस धारणा के साथ मैं क्षुद्र समझा जाता हूँ इस धारणा के योग से दुःख के अनुभव की वृद्धि होती है। इस प्रकार स्थिति के एकांत और सामाजिक दो विभाग हो जाने से कोई तो दोनों विभागों पर दृष्टि रख सकते हैं और कोई एक ही पर। शक्तिशाली और प्रतिभा सम्पन्न मनुष्य पहले यह प्रयत्न करते हैं कि ‘हम ऐसे हों’। फिर वैसे हो जाने पर यदि आवश्यक हुआ तो वे यह प्रयत्न भी करते हैं कि ‘हम ऐसे समझे जाएँ’। इन दोनों के प्रयत्न जुदा-जुदा हैं। संसार में शक्ति सम्पन्न सब नहीं होते, इससे बहुत से लोग स्थिति के पहले विभाग के लिए जिन प्रयत्नों की आवश्यकता है उनमें अपने को असमर्थ देख दूसरे ही विभाग से किसी प्रकार अपना संतोष करना चाहते हैं और उसी पर दृष्टि रखकर प्रयत्न करते हैं। ईर्ष्या ऐसे लोगों के हृदय में बहुत जगह पाती है और उनके प्रयत्नों में सहायक भी होती है। भाव प्रवर्तन आदि के बल से जिस समुदाय के प्राणी परस्पर ऐसे बन गए हैं कि अपने इंद्रियानुभव और भावनाओं तक को जवाब देकर दूसरों के इंद्रियानुभव और भावनाओं द्वारा निर्वाह कर सकते हैं, उसी से ईर्ष्या का विकास हो सकता है। अतः ईर्ष्या का अनन्य अधिकार मनुष्य जाति ही पर है। एक कुत्ता किसी दूसरे कुत्तों को कुछ खाते देख उसे आप खाने की इच्छा कर सकता है, पर वह यह नहीं चाह सकता कि चाहे हम खाएँ या न खाएँ वह दूसरा कुत्ता न खाने पाए। दूसरे कुत्तों की दृष्टि में हमारी स्थिति कैसी है, इसकी चिंता उस कुत्ते को न होगी। अपने विषय में दूसरों के चित्त में अच्छी धारणा उत्पन्न करने का प्रयत्न अच्छी बात है। इस प्रयत्न को जो बुरा रूप प्राप्त होता है वह असत्य के समावेश के कारण, दूसरों की धारणा की अवास्तविकता और अपनी स्थिति की सापेक्षता के कारण, जब हम अपने विषय में दूसरों की झूठी धारणा और अपनी स्थिति के सापेक्ष रूप मात्र से संतोष करना चाहते हैं तभी बुराइयों के लिए जगह होती है और ईर्ष्या की राह खुलती है। मनुष्य के लिए आनंददायक है
  1. Aमैं जैसा हूँ उससे बहुत अधिक बड़ा समझा जाता हूँ
  2. Bमैं जैसा हूँ उससे निम्न समझा जाता हूँ
  3. Cमैं जैसा हूँ वैसा ही जाना जाता हूँ
  4. Dमैं जैसा हूँ उससे बड़ा समझा जाता हूँ
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Correct answer: (D) मैं जैसा हूँ उससे बड़ा समझा जाता हूँ

Explanation

गद्यांश में लिखा है कि 'मैं बड़ा समझा जाता हूँ' यह निश्चय जुड़ने से आनंद या सुख बढ़ता है। अतः 'मैं जैसा हूँ उससे बड़ा समझा जाता हूँ' सही है; 'बहुत अधिक' की बात गद्यांश में नहीं है।

Q179CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 7 Feb 2026
नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर प्रश्न के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए : समाज में पड़ते ही मनुष्य देखने लगता है कि उसकी स्थिति दोहरी हो गई है। वह देखता है कि मैं यह हूँ, और मैं बड़ा समझा जाता हूँ। इस निश्चय के साथ एक यह निश्चय और जुड़ जाने से कि मैं बड़ा समझा जाता हूँ मनुष्य के आनंद या सुख के अनुभव में वृद्धि होती है। इसी प्रकार मैं क्षुद्र हूँ इस धारणा के साथ मैं क्षुद्र समझा जाता हूँ इस धारणा के योग से दुःख के अनुभव की वृद्धि होती है। इस प्रकार स्थिति के एकांत और सामाजिक दो विभाग हो जाने से कोई तो दोनों विभागों पर दृष्टि रख सकते हैं और कोई एक ही पर। शक्तिशाली और प्रतिभा सम्पन्न मनुष्य पहले यह प्रयत्न करते हैं कि ‘हम ऐसे हों’। फिर वैसे हो जाने पर यदि आवश्यक हुआ तो वे यह प्रयत्न भी करते हैं कि ‘हम ऐसे समझे जाएँ’। इन दोनों के प्रयत्न जुदा-जुदा हैं। संसार में शक्ति सम्पन्न सब नहीं होते, इससे बहुत से लोग स्थिति के पहले विभाग के लिए जिन प्रयत्नों की आवश्यकता है उनमें अपने को असमर्थ देख दूसरे ही विभाग से किसी प्रकार अपना संतोष करना चाहते हैं और उसी पर दृष्टि रखकर प्रयत्न करते हैं। ईर्ष्या ऐसे लोगों के हृदय में बहुत जगह पाती है और उनके प्रयत्नों में सहायक भी होती है। भाव प्रवर्तन आदि के बल से जिस समुदाय के प्राणी परस्पर ऐसे बन गए हैं कि अपने इंद्रियानुभव और भावनाओं तक को जवाब देकर दूसरों के इंद्रियानुभव और भावनाओं द्वारा निर्वाह कर सकते हैं, उसी से ईर्ष्या का विकास हो सकता है। अतः ईर्ष्या का अनन्य अधिकार मनुष्य जाति ही पर है। एक कुत्ता किसी दूसरे कुत्तों को कुछ खाते देख उसे आप खाने की इच्छा कर सकता है, पर वह यह नहीं चाह सकता कि चाहे हम खाएँ या न खाएँ वह दूसरा कुत्ता न खाने पाए। दूसरे कुत्तों की दृष्टि में हमारी स्थिति कैसी है, इसकी चिंता उस कुत्ते को न होगी। अपने विषय में दूसरों के चित्त में अच्छी धारणा उत्पन्न करने का प्रयत्न अच्छी बात है। इस प्रयत्न को जो बुरा रूप प्राप्त होता है वह असत्य के समावेश के कारण, दूसरों की धारणा की अवास्तविकता और अपनी स्थिति की सापेक्षता के कारण, जब हम अपने विषय में दूसरों की झूठी धारणा और अपनी स्थिति के सापेक्ष रूप मात्र से संतोष करना चाहते हैं तभी बुराइयों के लिए जगह होती है और ईर्ष्या की राह खुलती है। ईर्ष्या पर _____ का एकाधिकार है।
  1. Aप्राणी जगत्
  2. Bजानवरों
  3. Cमानव जाति
  4. Dन प्राणी जगत् का न मानव जगत् का
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Correct answer: (C) मानव जाति

Explanation

गद्यांश में स्पष्ट कहा गया है कि ईर्ष्या का अनन्य अधिकार मनुष्य जाति ही पर है; कुत्ते का उदाहरण देकर बताया गया है कि पशु ईर्ष्या नहीं करते। अतः उत्तर 'मानव जाति' है।

Q180CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 7 Feb 2026
नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर प्रश्न के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए : समाज में पड़ते ही मनुष्य देखने लगता है कि उसकी स्थिति दोहरी हो गई है। वह देखता है कि मैं यह हूँ, और मैं बड़ा समझा जाता हूँ। इस निश्चय के साथ एक यह निश्चय और जुड़ जाने से कि मैं बड़ा समझा जाता हूँ मनुष्य के आनंद या सुख के अनुभव में वृद्धि होती है। इसी प्रकार मैं क्षुद्र हूँ इस धारणा के साथ मैं क्षुद्र समझा जाता हूँ इस धारणा के योग से दुःख के अनुभव की वृद्धि होती है। इस प्रकार स्थिति के एकांत और सामाजिक दो विभाग हो जाने से कोई तो दोनों विभागों पर दृष्टि रख सकते हैं और कोई एक ही पर। शक्तिशाली और प्रतिभा सम्पन्न मनुष्य पहले यह प्रयत्न करते हैं कि ‘हम ऐसे हों’। फिर वैसे हो जाने पर यदि आवश्यक हुआ तो वे यह प्रयत्न भी करते हैं कि ‘हम ऐसे समझे जाएँ’। इन दोनों के प्रयत्न जुदा-जुदा हैं। संसार में शक्ति सम्पन्न सब नहीं होते, इससे बहुत से लोग स्थिति के पहले विभाग के लिए जिन प्रयत्नों की आवश्यकता है उनमें अपने को असमर्थ देख दूसरे ही विभाग से किसी प्रकार अपना संतोष करना चाहते हैं और उसी पर दृष्टि रखकर प्रयत्न करते हैं। ईर्ष्या ऐसे लोगों के हृदय में बहुत जगह पाती है और उनके प्रयत्नों में सहायक भी होती है। भाव प्रवर्तन आदि के बल से जिस समुदाय के प्राणी परस्पर ऐसे बन गए हैं कि अपने इंद्रियानुभव और भावनाओं तक को जवाब देकर दूसरों के इंद्रियानुभव और भावनाओं द्वारा निर्वाह कर सकते हैं, उसी से ईर्ष्या का विकास हो सकता है। अतः ईर्ष्या का अनन्य अधिकार मनुष्य जाति ही पर है। एक कुत्ता किसी दूसरे कुत्तों को कुछ खाते देख उसे आप खाने की इच्छा कर सकता है, पर वह यह नहीं चाह सकता कि चाहे हम खाएँ या न खाएँ वह दूसरा कुत्ता न खाने पाए। दूसरे कुत्तों की दृष्टि में हमारी स्थिति कैसी है, इसकी चिंता उस कुत्ते को न होगी। अपने विषय में दूसरों के चित्त में अच्छी धारणा उत्पन्न करने का प्रयत्न अच्छी बात है। इस प्रयत्न को जो बुरा रूप प्राप्त होता है वह असत्य के समावेश के कारण, दूसरों की धारणा की अवास्तविकता और अपनी स्थिति की सापेक्षता के कारण, जब हम अपने विषय में दूसरों की झूठी धारणा और अपनी स्थिति के सापेक्ष रूप मात्र से संतोष करना चाहते हैं तभी बुराइयों के लिए जगह होती है और ईर्ष्या की राह खुलती है। ‘मानव की स्थिति दोहरी हो गई है’ का आशय है
  1. Aजैसा हूँ वैसा नहीं समझा जाता
  2. Bजैसा हूँ वैसा ही समझा जाता हूँ
  3. Cन समझता हूँ, न समझना चाहता हूँ
  4. Dकोई कुछ भी समझे मुझे फर्क नहीं पड़ता
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Correct answer: (A) जैसा हूँ वैसा नहीं समझा जाता

Explanation

समाज में आकर मनुष्य की स्थिति दो भागों में बँट जाती है: वह जो वास्तव में है और वह जैसा समझा जाता है। ये दोनों अलग हो सकते हैं, यानी वह जैसा है वैसा नहीं समझा जाता; इसलिए विकल्प (1) सही है।

Q181CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 7 Feb 2026
नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर प्रश्न के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए : समाज में पड़ते ही मनुष्य देखने लगता है कि उसकी स्थिति दोहरी हो गई है। वह देखता है कि मैं यह हूँ, और मैं बड़ा समझा जाता हूँ। इस निश्चय के साथ एक यह निश्चय और जुड़ जाने से कि मैं बड़ा समझा जाता हूँ मनुष्य के आनंद या सुख के अनुभव में वृद्धि होती है। इसी प्रकार मैं क्षुद्र हूँ इस धारणा के साथ मैं क्षुद्र समझा जाता हूँ इस धारणा के योग से दुःख के अनुभव की वृद्धि होती है। इस प्रकार स्थिति के एकांत और सामाजिक दो विभाग हो जाने से कोई तो दोनों विभागों पर दृष्टि रख सकते हैं और कोई एक ही पर। शक्तिशाली और प्रतिभा सम्पन्न मनुष्य पहले यह प्रयत्न करते हैं कि ‘हम ऐसे हों’। फिर वैसे हो जाने पर यदि आवश्यक हुआ तो वे यह प्रयत्न भी करते हैं कि ‘हम ऐसे समझे जाएँ’। इन दोनों के प्रयत्न जुदा-जुदा हैं। संसार में शक्ति सम्पन्न सब नहीं होते, इससे बहुत से लोग स्थिति के पहले विभाग के लिए जिन प्रयत्नों की आवश्यकता है उनमें अपने को असमर्थ देख दूसरे ही विभाग से किसी प्रकार अपना संतोष करना चाहते हैं और उसी पर दृष्टि रखकर प्रयत्न करते हैं। ईर्ष्या ऐसे लोगों के हृदय में बहुत जगह पाती है और उनके प्रयत्नों में सहायक भी होती है। भाव प्रवर्तन आदि के बल से जिस समुदाय के प्राणी परस्पर ऐसे बन गए हैं कि अपने इंद्रियानुभव और भावनाओं तक को जवाब देकर दूसरों के इंद्रियानुभव और भावनाओं द्वारा निर्वाह कर सकते हैं, उसी से ईर्ष्या का विकास हो सकता है। अतः ईर्ष्या का अनन्य अधिकार मनुष्य जाति ही पर है। एक कुत्ता किसी दूसरे कुत्तों को कुछ खाते देख उसे आप खाने की इच्छा कर सकता है, पर वह यह नहीं चाह सकता कि चाहे हम खाएँ या न खाएँ वह दूसरा कुत्ता न खाने पाए। दूसरे कुत्तों की दृष्टि में हमारी स्थिति कैसी है, इसकी चिंता उस कुत्ते को न होगी। अपने विषय में दूसरों के चित्त में अच्छी धारणा उत्पन्न करने का प्रयत्न अच्छी बात है। इस प्रयत्न को जो बुरा रूप प्राप्त होता है वह असत्य के समावेश के कारण, दूसरों की धारणा की अवास्तविकता और अपनी स्थिति की सापेक्षता के कारण, जब हम अपने विषय में दूसरों की झूठी धारणा और अपनी स्थिति के सापेक्ष रूप मात्र से संतोष करना चाहते हैं तभी बुराइयों के लिए जगह होती है और ईर्ष्या की राह खुलती है। ‘ईर्ष्या ऐसे लोगों के हृदय में जगह पाती है’, का आशय है
  1. Aऐसे लोग ही ईर्ष्या करते हैं
  2. Bऐसे लोगों के हृदय में ईर्ष्या छिपी रहती है
  3. Cऐसे लोगों का हृदय ईर्ष्या से भर जाता है
  4. Dऐसे लोगों के हृदय में ईर्ष्या का घर होता है
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Correct answer: (C) ऐसे लोगों का हृदय ईर्ष्या से भर जाता है

Explanation

'ऐसे लोग' वे हैं जो अपने को असमर्थ पाकर केवल दूसरों की नज़र में बड़ा दिखने से संतोष करना चाहते हैं। 'ईर्ष्या हृदय में जगह पाती है' का अर्थ है कि उनका हृदय ईर्ष्या से भर जाता है।

Q182CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 7 Feb 2026
नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर प्रश्न के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए : समाज में पड़ते ही मनुष्य देखने लगता है कि उसकी स्थिति दोहरी हो गई है। वह देखता है कि मैं यह हूँ, और मैं बड़ा समझा जाता हूँ। इस निश्चय के साथ एक यह निश्चय और जुड़ जाने से कि मैं बड़ा समझा जाता हूँ मनुष्य के आनंद या सुख के अनुभव में वृद्धि होती है। इसी प्रकार मैं क्षुद्र हूँ इस धारणा के साथ मैं क्षुद्र समझा जाता हूँ इस धारणा के योग से दुःख के अनुभव की वृद्धि होती है। इस प्रकार स्थिति के एकांत और सामाजिक दो विभाग हो जाने से कोई तो दोनों विभागों पर दृष्टि रख सकते हैं और कोई एक ही पर। शक्तिशाली और प्रतिभा सम्पन्न मनुष्य पहले यह प्रयत्न करते हैं कि ‘हम ऐसे हों’। फिर वैसे हो जाने पर यदि आवश्यक हुआ तो वे यह प्रयत्न भी करते हैं कि ‘हम ऐसे समझे जाएँ’। इन दोनों के प्रयत्न जुदा-जुदा हैं। संसार में शक्ति सम्पन्न सब नहीं होते, इससे बहुत से लोग स्थिति के पहले विभाग के लिए जिन प्रयत्नों की आवश्यकता है उनमें अपने को असमर्थ देख दूसरे ही विभाग से किसी प्रकार अपना संतोष करना चाहते हैं और उसी पर दृष्टि रखकर प्रयत्न करते हैं। ईर्ष्या ऐसे लोगों के हृदय में बहुत जगह पाती है और उनके प्रयत्नों में सहायक भी होती है। भाव प्रवर्तन आदि के बल से जिस समुदाय के प्राणी परस्पर ऐसे बन गए हैं कि अपने इंद्रियानुभव और भावनाओं तक को जवाब देकर दूसरों के इंद्रियानुभव और भावनाओं द्वारा निर्वाह कर सकते हैं, उसी से ईर्ष्या का विकास हो सकता है। अतः ईर्ष्या का अनन्य अधिकार मनुष्य जाति ही पर है। एक कुत्ता किसी दूसरे कुत्तों को कुछ खाते देख उसे आप खाने की इच्छा कर सकता है, पर वह यह नहीं चाह सकता कि चाहे हम खाएँ या न खाएँ वह दूसरा कुत्ता न खाने पाए। दूसरे कुत्तों की दृष्टि में हमारी स्थिति कैसी है, इसकी चिंता उस कुत्ते को न होगी। अपने विषय में दूसरों के चित्त में अच्छी धारणा उत्पन्न करने का प्रयत्न अच्छी बात है। इस प्रयत्न को जो बुरा रूप प्राप्त होता है वह असत्य के समावेश के कारण, दूसरों की धारणा की अवास्तविकता और अपनी स्थिति की सापेक्षता के कारण, जब हम अपने विषय में दूसरों की झूठी धारणा और अपनी स्थिति के सापेक्ष रूप मात्र से संतोष करना चाहते हैं तभी बुराइयों के लिए जगह होती है और ईर्ष्या की राह खुलती है। सही कथन चुनिए :
  1. Aईर्ष्या का बहुवचन रूप है ईर्ष्ये।
  2. Bईर्ष्या का बहुवचन रूप है इर्ष्याएँ।
  3. Cईर्ष्या का बहुवचन रूप है ईर्ष्यायों।
  4. Dईर्ष्या का बहुवचन रूप नहीं होता।
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Correct answer: (D) ईर्ष्या का बहुवचन रूप नहीं होता।

Explanation

'ईर्ष्या' एक भाववाचक संज्ञा है। भाववाचक संज्ञाएँ सामान्यतः एकवचन में ही प्रयोग होती हैं, इसलिए 'ईर्ष्या' का बहुवचन रूप नहीं होता।

Q183CTET February 2026 Paper 2 Maths & Science, 7 Feb 2026
नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर प्रश्न के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए : समाज में पड़ते ही मनुष्य देखने लगता है कि उसकी स्थिति दोहरी हो गई है। वह देखता है कि मैं यह हूँ, और मैं बड़ा समझा जाता हूँ। इस निश्चय के साथ एक यह निश्चय और जुड़ जाने से कि मैं बड़ा समझा जाता हूँ मनुष्य के आनंद या सुख के अनुभव में वृद्धि होती है। इसी प्रकार मैं क्षुद्र हूँ इस धारणा के साथ मैं क्षुद्र समझा जाता हूँ इस धारणा के योग से दुःख के अनुभव की वृद्धि होती है। इस प्रकार स्थिति के एकांत और सामाजिक दो विभाग हो जाने से कोई तो दोनों विभागों पर दृष्टि रख सकते हैं और कोई एक ही पर। शक्तिशाली और प्रतिभा सम्पन्न मनुष्य पहले यह प्रयत्न करते हैं कि ‘हम ऐसे हों’। फिर वैसे हो जाने पर यदि आवश्यक हुआ तो वे यह प्रयत्न भी करते हैं कि ‘हम ऐसे समझे जाएँ’। इन दोनों के प्रयत्न जुदा-जुदा हैं। संसार में शक्ति सम्पन्न सब नहीं होते, इससे बहुत से लोग स्थिति के पहले विभाग के लिए जिन प्रयत्नों की आवश्यकता है उनमें अपने को असमर्थ देख दूसरे ही विभाग से किसी प्रकार अपना संतोष करना चाहते हैं और उसी पर दृष्टि रखकर प्रयत्न करते हैं। ईर्ष्या ऐसे लोगों के हृदय में बहुत जगह पाती है और उनके प्रयत्नों में सहायक भी होती है। भाव प्रवर्तन आदि के बल से जिस समुदाय के प्राणी परस्पर ऐसे बन गए हैं कि अपने इंद्रियानुभव और भावनाओं तक को जवाब देकर दूसरों के इंद्रियानुभव और भावनाओं द्वारा निर्वाह कर सकते हैं, उसी से ईर्ष्या का विकास हो सकता है। अतः ईर्ष्या का अनन्य अधिकार मनुष्य जाति ही पर है। एक कुत्ता किसी दूसरे कुत्तों को कुछ खाते देख उसे आप खाने की इच्छा कर सकता है, पर वह यह नहीं चाह सकता कि चाहे हम खाएँ या न खाएँ वह दूसरा कुत्ता न खाने पाए। दूसरे कुत्तों की दृष्टि में हमारी स्थिति कैसी है, इसकी चिंता उस कुत्ते को न होगी। अपने विषय में दूसरों के चित्त में अच्छी धारणा उत्पन्न करने का प्रयत्न अच्छी बात है। इस प्रयत्न को जो बुरा रूप प्राप्त होता है वह असत्य के समावेश के कारण, दूसरों की धारणा की अवास्तविकता और अपनी स्थिति की सापेक्षता के कारण, जब हम अपने विषय में दूसरों की झूठी धारणा और अपनी स्थिति के सापेक्ष रूप मात्र से संतोष करना चाहते हैं तभी बुराइयों के लिए जगह होती है और ईर्ष्या की राह खुलती है। “दृष्टि रखकर प्रयत्न करते हैं” में ‘रखकर’ _____ है।
  1. Aक्रिया
  2. Bवर्तमानकालिक कृदंत
  3. Cभूतकालिक कृदंत
  4. Dसंयोजक
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Correct answer: (C) भूतकालिक कृदंत

Explanation

'रखकर' धातु 'रख' में 'कर' जोड़कर बना कृदंत है, जो बताता है कि 'प्रयत्न करने' से पहले 'दृष्टि रखने' का काम पूरा हो चुका है। पूरी हो चुकी क्रिया का बोध कराने के कारण आधिकारिक उत्तर इसे भूतकालिक कृदंत मानता है (व्याकरण में इसे पूर्वकालिक कृदंत भी कहते हैं)।

Q184CTET February 2026 Paper 1, 1 Mar 2026
निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों (प्र.सं. 121 से 128) में सही/सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए । वे लोग आधुनिक भारत के नए शरणार्थी हैं, जिन्हें औद्योगीकरण के झंझावात ने अपनी घर-ज़मीन से उखाड़कर हमेशा के लिए निर्वासित कर दिया है । प्रकृति और इतिहास के बीच यह गहरा अंतर है । बाढ़ या भूकंप के कारण लोग अपना घर-बार छोड़कर कुछ अरसे के लिए ज़रूर बाहर चले जाते हैं, किंतु आफ़त टलते ही वे दोबारा अपने जाने-पहचाने परिवेश में लौट भी आते हैं । किंतु विकास और प्रगति के नाम पर जब इतिहास लोगों को उन्मूलित करता है, तो वे फिर कभी अपने घर वापस नहीं लौट सकते । भारत के नए शरणार्थी कौन हैं ?
  1. Aबाढ़ के कारण विस्थापित लोग
  2. Bऔद्योगीकरण के कारण विस्थापित लोग
  3. Cअकाल के कारण विस्थापित लोग
  4. Dभूकंप के कारण विस्थापित लोग
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Correct answer: (B) औद्योगीकरण के कारण विस्थापित लोग

Explanation

गद्यांश के पहले वाक्य में कहा गया है कि नए शरणार्थी वे लोग हैं जिन्हें औद्योगीकरण ने उनकी घर-ज़मीन से उखाड़ दिया है। अतः सही उत्तर औद्योगीकरण के कारण विस्थापित लोग है।

Q185CTET February 2026 Paper 1, 1 Mar 2026
निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों (प्र.सं. 121 से 128) में सही/सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए । वे लोग आधुनिक भारत के नए शरणार्थी हैं, जिन्हें औद्योगीकरण के झंझावात ने अपनी घर-ज़मीन से उखाड़कर हमेशा के लिए निर्वासित कर दिया है । प्रकृति और इतिहास के बीच यह गहरा अंतर है । बाढ़ या भूकंप के कारण लोग अपना घर-बार छोड़कर कुछ अरसे के लिए ज़रूर बाहर चले जाते हैं, किंतु आफ़त टलते ही वे दोबारा अपने जाने-पहचाने परिवेश में लौट भी आते हैं । किंतु विकास और प्रगति के नाम पर जब इतिहास लोगों को उन्मूलित करता है, तो वे फिर कभी अपने घर वापस नहीं लौट सकते । ‘औद्योगीकरण के झंझावात ने अपनी घर-ज़मीन से उखाड़कर हमेशा के लिए निर्वासित कर दिया है ।’ वाक्य से आशय है :
  1. Aघर-ज़मीन बेचकर पैसा कमाने में लगे रहना
  2. Bनिर्वासित होने के दुख को झेलने की विवशता
  3. Cआँधी-तूफान के कारण घर छोड़ने की विवशता
  4. Dऔद्योगीकरण के कारण अपने घर छोड़ने की विवशता
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Correct answer: (D) औद्योगीकरण के कारण अपने घर छोड़ने की विवशता

Explanation

इस वाक्य का आशय है कि औद्योगीकरण के कारण लोगों को मजबूरी में अपना घर छोड़ना पड़ा और वे फिर लौट नहीं सके।

Q186CTET February 2026 Paper 1, 1 Mar 2026
निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों (प्र.सं. 121 से 128) में सही/सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए । वे लोग आधुनिक भारत के नए शरणार्थी हैं, जिन्हें औद्योगीकरण के झंझावात ने अपनी घर-ज़मीन से उखाड़कर हमेशा के लिए निर्वासित कर दिया है । प्रकृति और इतिहास के बीच यह गहरा अंतर है । बाढ़ या भूकंप के कारण लोग अपना घर-बार छोड़कर कुछ अरसे के लिए ज़रूर बाहर चले जाते हैं, किंतु आफ़त टलते ही वे दोबारा अपने जाने-पहचाने परिवेश में लौट भी आते हैं । किंतु विकास और प्रगति के नाम पर जब इतिहास लोगों को उन्मूलित करता है, तो वे फिर कभी अपने घर वापस नहीं लौट सकते । गद्यांश के अनुसार कौन-सा कथन सत्य है ?
  1. Aप्रकृति के कारण हुआ विस्थापन स्थायी होता है ।
  2. Bउद्योग-धंधों के कारण हुआ विस्थापन अस्थायी होता है ।
  3. Cउद्योगों के कारण हुआ विस्थापन स्थायी होता है ।
  4. Dप्रकृति लोगों को विस्थापित नहीं करती है ।
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Correct answer: (C) उद्योगों के कारण हुआ विस्थापन स्थायी होता है ।

Explanation

गद्यांश के अनुसार बाढ़-भूकंप से हटे लोग लौट आते हैं, पर विकास और प्रगति (उद्योगों) के नाम पर उजड़े लोग कभी वापस नहीं लौटते। इसलिए उद्योगों से हुआ विस्थापन स्थायी है।

Q187CTET February 2026 Paper 1, 1 Mar 2026
निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों (प्र.सं. 121 से 128) में सही/सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए । वे लोग आधुनिक भारत के नए शरणार्थी हैं, जिन्हें औद्योगीकरण के झंझावात ने अपनी घर-ज़मीन से उखाड़कर हमेशा के लिए निर्वासित कर दिया है । प्रकृति और इतिहास के बीच यह गहरा अंतर है । बाढ़ या भूकंप के कारण लोग अपना घर-बार छोड़कर कुछ अरसे के लिए ज़रूर बाहर चले जाते हैं, किंतु आफ़त टलते ही वे दोबारा अपने जाने-पहचाने परिवेश में लौट भी आते हैं । किंतु विकास और प्रगति के नाम पर जब इतिहास लोगों को उन्मूलित करता है, तो वे फिर कभी अपने घर वापस नहीं लौट सकते । ‘औद्योगीकरण के झंझावात ने अपनी घर-ज़मीन से उखाड़कर हमेशा के लिए निर्वासित कर दिया है ।’ वाक्य में रेखांकित शब्द से आशय है : (रेखांकित शब्द: झंझावात)
  1. Aझंझट
  2. Bतूफान
  3. Cझंकार
  4. Dझमेले
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Correct answer: (B) तूफान

Explanation

‘झंझावात’ का अर्थ है तेज़ आँधी या तूफान। यहाँ औद्योगीकरण की तेज़ लहर को तूफान कहा गया है।

Q188CTET February 2026 Paper 1, 1 Mar 2026
निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों (प्र.सं. 121 से 128) में सही/सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए । वे लोग आधुनिक भारत के नए शरणार्थी हैं, जिन्हें औद्योगीकरण के झंझावात ने अपनी घर-ज़मीन से उखाड़कर हमेशा के लिए निर्वासित कर दिया है । प्रकृति और इतिहास के बीच यह गहरा अंतर है । बाढ़ या भूकंप के कारण लोग अपना घर-बार छोड़कर कुछ अरसे के लिए ज़रूर बाहर चले जाते हैं, किंतु आफ़त टलते ही वे दोबारा अपने जाने-पहचाने परिवेश में लौट भी आते हैं । किंतु विकास और प्रगति के नाम पर जब इतिहास लोगों को उन्मूलित करता है, तो वे फिर कभी अपने घर वापस नहीं लौट सकते । गद्यांश के अनुसार __________, __________ और __________ लोगों के विस्थापन के लिए उत्तरदायी हैं ।
  1. Aबाढ़, भूकंप, प्रकृति
  2. Bबाढ़, भूकंप, उद्योग
  3. Cप्रकृति, उद्योग, शरणार्थी
  4. Dबाढ़, भूकंप, रोजगार
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Correct answer: (B) बाढ़, भूकंप, उद्योग

Explanation

गद्यांश में बाढ़ और भूकंप (प्रकृति) तथा औद्योगीकरण (उद्योग) को लोगों के विस्थापन का कारण बताया गया है।

Q189CTET February 2026 Paper 1, 1 Mar 2026
निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों (प्र.सं. 121 से 128) में सही/सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए । वे लोग आधुनिक भारत के नए शरणार्थी हैं, जिन्हें औद्योगीकरण के झंझावात ने अपनी घर-ज़मीन से उखाड़कर हमेशा के लिए निर्वासित कर दिया है । प्रकृति और इतिहास के बीच यह गहरा अंतर है । बाढ़ या भूकंप के कारण लोग अपना घर-बार छोड़कर कुछ अरसे के लिए ज़रूर बाहर चले जाते हैं, किंतु आफ़त टलते ही वे दोबारा अपने जाने-पहचाने परिवेश में लौट भी आते हैं । किंतु विकास और प्रगति के नाम पर जब इतिहास लोगों को उन्मूलित करता है, तो वे फिर कभी अपने घर वापस नहीं लौट सकते । समूह से भिन्न शब्द-युग्म है :
  1. Aघर-ज़मीन
  2. Bउद्योग-धंधे
  3. Cगाँव-शहर
  4. Dजाने-पहचाने
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Correct answer: (D) जाने-पहचाने

Explanation

घर-ज़मीन, उद्योग-धंधे और गाँव-शहर संज्ञा शब्दों के युग्म हैं, जबकि ‘जाने-पहचाने’ विशेषण (कृदंत) शब्दों का युग्म है। इसलिए यह समूह से भिन्न है।

Q190CTET February 2026 Paper 1, 1 Mar 2026
निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों (प्र.सं. 121 से 128) में सही/सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए । वे लोग आधुनिक भारत के नए शरणार्थी हैं, जिन्हें औद्योगीकरण के झंझावात ने अपनी घर-ज़मीन से उखाड़कर हमेशा के लिए निर्वासित कर दिया है । प्रकृति और इतिहास के बीच यह गहरा अंतर है । बाढ़ या भूकंप के कारण लोग अपना घर-बार छोड़कर कुछ अरसे के लिए ज़रूर बाहर चले जाते हैं, किंतु आफ़त टलते ही वे दोबारा अपने जाने-पहचाने परिवेश में लौट भी आते हैं । किंतु विकास और प्रगति के नाम पर जब इतिहास लोगों को उन्मूलित करता है, तो वे फिर कभी अपने घर वापस नहीं लौट सकते । ‘घर’ का पर्यायवाची शब्द नहीं है :
  1. Aनिकेत
  2. Bभुवन
  3. Cआलय
  4. Dगेह
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Correct answer: (B) भुवन

Explanation

निकेत, आलय और गेह ‘घर’ के पर्यायवाची हैं, जबकि ‘भुवन’ का अर्थ संसार या लोक है।

Q191CTET February 2026 Paper 1, 1 Mar 2026
निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों (प्र.सं. 121 से 128) में सही/सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए । वे लोग आधुनिक भारत के नए शरणार्थी हैं, जिन्हें औद्योगीकरण के झंझावात ने अपनी घर-ज़मीन से उखाड़कर हमेशा के लिए निर्वासित कर दिया है । प्रकृति और इतिहास के बीच यह गहरा अंतर है । बाढ़ या भूकंप के कारण लोग अपना घर-बार छोड़कर कुछ अरसे के लिए ज़रूर बाहर चले जाते हैं, किंतु आफ़त टलते ही वे दोबारा अपने जाने-पहचाने परिवेश में लौट भी आते हैं । किंतु विकास और प्रगति के नाम पर जब इतिहास लोगों को उन्मूलित करता है, तो वे फिर कभी अपने घर वापस नहीं लौट सकते । विशेषण-विशेष्य का उदाहरण नहीं है :
  1. Aआधुनिक भारत
  2. Bजाने-पहचाने परिवेश
  3. Cघर-बार
  4. Dनए शरणार्थी
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Correct answer: (C) घर-बार

Explanation

‘आधुनिक भारत’, ‘जाने-पहचाने परिवेश’ और ‘नए शरणार्थी’ में पहला शब्द विशेषण और दूसरा विशेष्य है। ‘घर-बार’ दो संज्ञाओं का युग्म (द्वंद्व) है, विशेषण-विशेष्य नहीं।

Q192CTET February 2026 Paper 1, 1 Mar 2026
‘सहपाठी समीक्षा’ को विद्यार्थियों की लेखन प्रक्रिया में सुधार लाने के लिए एक महत्त्वपूर्ण युक्ति माना जाता है । ‘सहपाठी समीक्षा’ का क्या उद्देश्य है ?
  1. Aविचारों को सम्बद्ध करना और लेखन हेतु अनुच्छेद तैयार करना ।
  2. Bविद्यार्थियों के लेखन के मूल्यांकन में अध्यापक की मदद करना ।
  3. Cअपने सहपाठियों को रचनात्मक पृष्ठपोषण देना, जिसके माध्यम से उन्हें अपने प्रारूप में सुधार लाने के लिए मदद मिलेगी ।
  4. Dअपने सहपाठियों की गलतियों को निकालने के लिए प्रोत्साहित करना ।
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Correct answer: (C) अपने सहपाठियों को रचनात्मक पृष्ठपोषण देना, जिसके माध्यम से उन्हें अपने प्रारूप में सुधार लाने के लिए मदद मिलेगी ।

Explanation

सहपाठी समीक्षा में विद्यार्थी एक-दूसरे के प्रारूप पढ़कर रचनात्मक सुझाव (पृष्ठपोषण) देते हैं, जिससे लेखक अपना लेखन सुधार सके।

Q193CTET February 2026 Paper 1, 1 Mar 2026
निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों (प्र.सं. 144 से 150) में सही/सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए । जब हम आध्यात्मिक चेतना से जुड़ते हैं, तब हमारे अंदर एक बहुत बड़ा बदलाव आता है । हम दूसरों के साथ प्रेम और सम्मान के साथ व्यवहार करना शुरू कर देते हैं । हमारा अहंकार कम हो जाता है और हम महसूस करते हैं कि आत्मा के स्तर पर हम सभी एकसमान हैं । हम सबसे प्यार करने लग जाते हैं । हम दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा हम चाहते हैं कि लोग हमारे साथ करें । जब हम अपना द्वैत भाव खो देते हैं, तो हम परमात्मा के साथ एक हो जाते हैं । हम अनुभव करते हैं कि केवल एक ही परमात्मा है जो कई हिस्सों में विभाजित है । यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने अंदर इस अनुभूति को प्राप्त कर लेता है कि एक जमा एक बराबर एक होता है, तो यह दुनिया एक दिन शांति और प्रेम का स्थल बन जाएगी । आध्यात्मिक चेतना से जुड़ने पर मनुष्य दूसरों से व्यवहार करता है :
  1. Aप्रेम और विद्वेष का
  2. Bप्रेम और आदर का
  3. Cप्रेम और समानता का
  4. Dप्रेम और स्नेह का
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Correct answer: (B) प्रेम और आदर का

Explanation

गद्यांश में लिखा है कि आध्यात्मिक चेतना से जुड़ने पर हम दूसरों के साथ प्रेम और सम्मान के साथ व्यवहार करने लगते हैं; सम्मान का अर्थ आदर है।

Q194CTET February 2026 Paper 1, 1 Mar 2026
निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों (प्र.सं. 144 से 150) में सही/सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए । जब हम आध्यात्मिक चेतना से जुड़ते हैं, तब हमारे अंदर एक बहुत बड़ा बदलाव आता है । हम दूसरों के साथ प्रेम और सम्मान के साथ व्यवहार करना शुरू कर देते हैं । हमारा अहंकार कम हो जाता है और हम महसूस करते हैं कि आत्मा के स्तर पर हम सभी एकसमान हैं । हम सबसे प्यार करने लग जाते हैं । हम दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा हम चाहते हैं कि लोग हमारे साथ करें । जब हम अपना द्वैत भाव खो देते हैं, तो हम परमात्मा के साथ एक हो जाते हैं । हम अनुभव करते हैं कि केवल एक ही परमात्मा है जो कई हिस्सों में विभाजित है । यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने अंदर इस अनुभूति को प्राप्त कर लेता है कि एक जमा एक बराबर एक होता है, तो यह दुनिया एक दिन शांति और प्रेम का स्थल बन जाएगी । ‘जब हमारा अहंकार कम हो जाता है और हम महसूस करते हैं कि आत्मा के स्तर पर हम सभी एकसमान हैं ।’ वाक्य से आशय है :
  1. Aव्यक्ति अहंकारयुक्त होने पर सभी को एकसमान समझने लगता है ।
  2. Bव्यक्ति अहंकारमुक्त होने पर सभी को एकसमान समझने लगता है ।
  3. Cव्यक्ति अहंकारवश स्वयं को दूसरों से अलग समझता है ।
  4. Dसभी व्यक्तियों में अहंकार होता है और वे सभी को एकसमान समझने लगते हैं ।
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Correct answer: (B) व्यक्ति अहंकारमुक्त होने पर सभी को एकसमान समझने लगता है ।

Explanation

अहंकार कम होने पर व्यक्ति अहंकारमुक्त होकर सबको आत्मा के स्तर पर एकसमान समझने लगता है।

Q195CTET February 2026 Paper 1, 1 Mar 2026
निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों (प्र.सं. 144 से 150) में सही/सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए । जब हम आध्यात्मिक चेतना से जुड़ते हैं, तब हमारे अंदर एक बहुत बड़ा बदलाव आता है । हम दूसरों के साथ प्रेम और सम्मान के साथ व्यवहार करना शुरू कर देते हैं । हमारा अहंकार कम हो जाता है और हम महसूस करते हैं कि आत्मा के स्तर पर हम सभी एकसमान हैं । हम सबसे प्यार करने लग जाते हैं । हम दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा हम चाहते हैं कि लोग हमारे साथ करें । जब हम अपना द्वैत भाव खो देते हैं, तो हम परमात्मा के साथ एक हो जाते हैं । हम अनुभव करते हैं कि केवल एक ही परमात्मा है जो कई हिस्सों में विभाजित है । यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने अंदर इस अनुभूति को प्राप्त कर लेता है कि एक जमा एक बराबर एक होता है, तो यह दुनिया एक दिन शांति और प्रेम का स्थल बन जाएगी । ‘यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने अंदर इस अनुभूति को प्राप्त कर लेता है कि एक जमा एक बराबर एक होता है, तो यह दुनिया एक दिन शांति और प्रेम का स्थल बन जाएगी ।’ इससे आप क्या समझते हैं ?
  1. Aएक में एक मिलाने पर दो बनते हैं ।
  2. Bमनुष्य में द्वैत भाव की समाप्ति पर ही प्रेम और शांति की स्थापना संभव है ।
  3. Cएक में एक मिलाने पर शांति प्राप्त होती है ।
  4. Dएक में एक मिलाने पर एक ही बनता है ।
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Correct answer: (B) मनुष्य में द्वैत भाव की समाप्ति पर ही प्रेम और शांति की स्थापना संभव है ।

Explanation

‘एक जमा एक बराबर एक’ का भाव है कि ‘मैं’ और ‘दूसरा’ का भेद (द्वैत भाव) मिट जाए। गद्यांश के अनुसार द्वैत भाव समाप्त होने पर ही दुनिया में प्रेम और शांति स्थापित हो सकती है।

Q196CTET February 2026 Paper 1, 1 Mar 2026
निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों (प्र.सं. 144 से 150) में सही/सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए । जब हम आध्यात्मिक चेतना से जुड़ते हैं, तब हमारे अंदर एक बहुत बड़ा बदलाव आता है । हम दूसरों के साथ प्रेम और सम्मान के साथ व्यवहार करना शुरू कर देते हैं । हमारा अहंकार कम हो जाता है और हम महसूस करते हैं कि आत्मा के स्तर पर हम सभी एकसमान हैं । हम सबसे प्यार करने लग जाते हैं । हम दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा हम चाहते हैं कि लोग हमारे साथ करें । जब हम अपना द्वैत भाव खो देते हैं, तो हम परमात्मा के साथ एक हो जाते हैं । हम अनुभव करते हैं कि केवल एक ही परमात्मा है जो कई हिस्सों में विभाजित है । यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने अंदर इस अनुभूति को प्राप्त कर लेता है कि एक जमा एक बराबर एक होता है, तो यह दुनिया एक दिन शांति और प्रेम का स्थल बन जाएगी । ‘द्वैत भाव खो देना’ से आशय है :
  1. Aअपने पराए का भेद न कर पाना
  2. Bअहं को त्यागना
  3. Cवैर भाव मिट जाना
  4. Dस्वयं और परमात्मा का भेद मिटना
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Correct answer: (D) स्वयं और परमात्मा का भेद मिटना

Explanation

गद्यांश में कहा गया है कि द्वैत भाव खोने पर हम परमात्मा के साथ एक हो जाते हैं, अर्थात् स्वयं और परमात्मा का भेद मिट जाता है।

Q197CTET February 2026 Paper 1, 1 Mar 2026
निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों (प्र.सं. 144 से 150) में सही/सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए । जब हम आध्यात्मिक चेतना से जुड़ते हैं, तब हमारे अंदर एक बहुत बड़ा बदलाव आता है । हम दूसरों के साथ प्रेम और सम्मान के साथ व्यवहार करना शुरू कर देते हैं । हमारा अहंकार कम हो जाता है और हम महसूस करते हैं कि आत्मा के स्तर पर हम सभी एकसमान हैं । हम सबसे प्यार करने लग जाते हैं । हम दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा हम चाहते हैं कि लोग हमारे साथ करें । जब हम अपना द्वैत भाव खो देते हैं, तो हम परमात्मा के साथ एक हो जाते हैं । हम अनुभव करते हैं कि केवल एक ही परमात्मा है जो कई हिस्सों में विभाजित है । यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने अंदर इस अनुभूति को प्राप्त कर लेता है कि एक जमा एक बराबर एक होता है, तो यह दुनिया एक दिन शांति और प्रेम का स्थल बन जाएगी । ‘चेतना’ का विलोम शब्द है :
  1. Aजड़ता
  2. Bजड़
  3. Cनिर्जीव
  4. Dचैतन्य
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Correct answer: (A) जड़ता

Explanation

‘चेतना’ (सजगता, जागृति) संज्ञा है, इसका विलोम भाववाचक संज्ञा ‘जड़ता’ है। ‘जड़’ विशेषण रूप में ‘चेतन’ का विलोम है।

Q198CTET February 2026 Paper 1, 1 Mar 2026
निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों (प्र.सं. 144 से 150) में सही/सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए । जब हम आध्यात्मिक चेतना से जुड़ते हैं, तब हमारे अंदर एक बहुत बड़ा बदलाव आता है । हम दूसरों के साथ प्रेम और सम्मान के साथ व्यवहार करना शुरू कर देते हैं । हमारा अहंकार कम हो जाता है और हम महसूस करते हैं कि आत्मा के स्तर पर हम सभी एकसमान हैं । हम सबसे प्यार करने लग जाते हैं । हम दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा हम चाहते हैं कि लोग हमारे साथ करें । जब हम अपना द्वैत भाव खो देते हैं, तो हम परमात्मा के साथ एक हो जाते हैं । हम अनुभव करते हैं कि केवल एक ही परमात्मा है जो कई हिस्सों में विभाजित है । यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने अंदर इस अनुभूति को प्राप्त कर लेता है कि एक जमा एक बराबर एक होता है, तो यह दुनिया एक दिन शांति और प्रेम का स्थल बन जाएगी । समूह से भिन्न शब्द है :
  1. Aअनुभव
  2. Bअनुसार
  3. Cअनुभूति
  4. Dअनुमति
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Correct answer: (B) अनुसार

Explanation

अनुभव, अनुभूति और अनुमति संज्ञा शब्द हैं, जबकि ‘अनुसार’ अव्यय (संबंधबोधक) है। इसलिए यह समूह से भिन्न है।

Q199CTET February 2026 Paper 1, 1 Mar 2026
निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों (प्र.सं. 144 से 150) में सही/सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए । जब हम आध्यात्मिक चेतना से जुड़ते हैं, तब हमारे अंदर एक बहुत बड़ा बदलाव आता है । हम दूसरों के साथ प्रेम और सम्मान के साथ व्यवहार करना शुरू कर देते हैं । हमारा अहंकार कम हो जाता है और हम महसूस करते हैं कि आत्मा के स्तर पर हम सभी एकसमान हैं । हम सबसे प्यार करने लग जाते हैं । हम दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा हम चाहते हैं कि लोग हमारे साथ करें । जब हम अपना द्वैत भाव खो देते हैं, तो हम परमात्मा के साथ एक हो जाते हैं । हम अनुभव करते हैं कि केवल एक ही परमात्मा है जो कई हिस्सों में विभाजित है । यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने अंदर इस अनुभूति को प्राप्त कर लेता है कि एक जमा एक बराबर एक होता है, तो यह दुनिया एक दिन शांति और प्रेम का स्थल बन जाएगी । ‘सम्मान’ का विलोम शब्द है :
  1. Aसम्मानित
  2. Bअसमान
  3. Cनिरादर
  4. Dअसम्मान
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Correct answer: (D) असम्मान

Explanation

Note: the official key gives (4); ‘निरादर’ (3) भी ‘सम्मान’ का प्रचलित विलोम है। ‘सम्मान’ में ‘अ’ उपसर्ग जोड़कर बना ‘असम्मान’ इसका सीधा विलोम है, इसलिए कुंजी ने इसे सही माना है। ‘असमान’ का अर्थ बराबर न होना है और ‘सम्मानित’ विशेषण है।

Q200CTET February 2026 Paper 1, 8 Feb 2026
निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प का चयन कीजिए। प्रत्येक व्यक्ति का जन्म राजा बनने के लिए हुआ है, इसे इस रूप में भी समझ सकते हैं कि हर व्यक्ति के पूरे जीवन का सतत संघर्ष एक सत्ता को पाना है। ऐसी सत्ता जिसकी प्रकृति, जिसकी सीमाएँ, जिसके व्यवहार को वह व्यक्ति स्वयं निर्धारित करता है। इस संघर्ष के अलग-अलग रूप हम अपने आसपास के तमाम रिश्तों में भी देख सकते हैं। परिवार के अंदर भी यह चीज दिखती है। उदाहरण के लिए एक परिवार में कोई एक व्यक्ति मुखिया बनकर अपनी भूमिका का विस्तार करता है और उस परिवार जैसी इकाई का राजा बनता है। कोई व्यक्ति अपनी कॉलोनी में लीडर बनता है तो कोई गली-मोहल्ले का राजा बनना चाहता है। कोई विधायक, सांसद, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री बनकर अपनी सीमाओं का विस्तार करना और एक बड़े हिस्से का राजा बनना चाहता है। जो इन सब चक्करों में नहीं है, अकेला व्यक्ति है, वह भी अपने शरीर का राजा बनना चाहता है। अपने शरीर पर अपना अधिकार भी बड़ी बात है। गद्यांश के अनुसार __________ और __________ जीवन का सत्य हैं।
  1. Aसंघर्ष, मुख्यमंत्री होना
  2. Bमुख्यमंत्री होना, सीमाएँ
  3. Cसीमाएँ, परिवार
  4. Dसंघर्ष, नेतृत्व करना
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Correct answer: (D) संघर्ष, नेतृत्व करना

Explanation

गद्यांश के अनुसार हर व्यक्ति का पूरा जीवन सत्ता पाने का सतत संघर्ष है और हर व्यक्ति किसी न किसी इकाई का राजा या मुखिया बनकर नेतृत्व करना चाहता है। इसलिए संघर्ष और नेतृत्व करना जीवन का सत्य हैं।

How to use these CTET Hindi questions

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